
भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” की नीति को और कड़ा करते हुए, भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पद्मा जायसवाल को सेवा से तत्काल बर्खास्त करने के आदेश को मंजूरी दे दी है। 2003 बैच की एजीएमयूटी (AGMUT) कैडर की अधिकारी जायसवाल पर अरुणाचल प्रदेश में जिला कलेक्टर के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान सरकारी धन के गबन का गंभीर आरोप था।
यह बर्खास्तगी भारत के प्रशासनिक इतिहास में एक दुर्लभ घटना है, क्योंकि अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा के कारण उन्हें सेवा से निकालना एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया मानी जाती है। पद्मा जायसवाल अपनी बर्खास्तगी के समय दिल्ली सरकार के प्रशासनिक सुधार विभाग में विशेष सचिव के रूप में कार्यरत थीं।
अरुणाचल प्रदेश: ₹28 लाख के गबन का मामला
पद्मा जायसवाल के खिलाफ यह मामला वर्ष 2007-08 का है, जब वे अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले की जिला कलेक्टर (DC) थीं। स्थानीय निवासियों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों के बाद हुई जांच में सामने आया कि उन्होंने लगभग ₹28 लाख की सरकारी धनराशि का दुरुपयोग किया था।
आरोपों के अनुसार, इस राशि का इस्तेमाल उन्होंने अपने रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी संपत्तियां खरीदने के लिए किया था। सीबीआई (CBI) और गृह मंत्रालय की जांच में पाया गया कि उन्होंने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग करते हुए वित्तीय रिकॉर्ड में हेराफेरी की थी। फरवरी 2008 में वेस्ट कामेंग के नागरिकों द्वारा शुरू की गई यह कानूनी लड़ाई 18 साल के लंबे अंतराल के बाद अपने तार्किक अंजाम तक पहुंची है।
न्याय की लंबी राह: महत्वपूर्ण घटनाक्रम
इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ 1 अप्रैल 2026 को आया, जब दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने अधिकार क्षेत्र के आधार पर इस कार्यवाही को रोक दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि एजीएमयूटी कैडर के अधिकारियों के अनुशासनात्मक मामलों में केंद्र सरकार का अधिकार सर्वोपरि है।
| तिथि | मुख्य घटनाक्रम |
| फरवरी 2008 | भ्रष्टाचार की पहली औपचारिक शिकायत दर्ज। |
| अप्रैल 2008 | सरकार द्वारा जायसवाल को निलंबित किया गया। |
| 2010-2024 | विभागीय जांच और लंबी कानूनी प्रक्रिया जारी रही। |
| 1 अप्रैल 2026 | दिल्ली हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी की राह में आने वाली कानूनी बाधा को हटाया। |
| 15 मई 2026 | राष्ट्रपति ने बर्खास्तगी आदेश पर हस्ताक्षर किए। |
आईएएस की बर्खास्तगी: एक दुर्लभ प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत सिविल सेवकों को विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है। किसी भी आईएएस अधिकारी को केवल राष्ट्रपति ही बर्खास्त कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में यूपीएससी (UPSC), सीवीसी (CVC) और गृह मंत्रालय की गहन संस्तुति आवश्यक होती है। पद्मा जायसवाल का मामला यह साबित करता है कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में भले ही समय लगे, लेकिन कानून के लंबे हाथों से बचना नामुमकिन है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल एक भ्रष्ट अधिकारी को दंडित करता है, बल्कि पूरी नौकरशाही को यह संदेश देता है कि सरकारी पद का दुरुपयोग और जनता के धन की लूट बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि 18 साल का समय न्याय के लिए बहुत लंबा है और प्रशासनिक सुधारों के जरिए ऐसी जांच प्रक्रियाओं को और तेज़ करने की आवश्यकता है।
जब पद्मा जायसवाल से इस संबंध में प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अभी तक आदेश की औपचारिक जानकारी नहीं मिली है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे इस आदेश को पुनः अदालत में चुनौती देती हैं। फिलहाल, यह कदम केंद्र सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि को और मजबूती प्रदान करता है।




