
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान के समाप्त होते ही, राज्य का राजनीतिक माहौल मतदान केंद्रों से हटकर अब डेटा और सुरक्षा की जंग में तब्दील हो गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने आधिकारिक तौर पर एग्जिट पोल के नतीजों को खारिज कर दिया है। पार्टी ने इन अनुमानों को “काल्पनिक कथा” और “मीडिया का खेल” करार दिया है, जिसका उद्देश्य 2 मई को होने वाली मतगणना से पहले जनमत को प्रभावित करना है।
एग्जिट पोल को खारिज करने के साथ-साथ, राज्य के विभिन्न मतगणना केंद्रों के बाहर ईवीएम (EVM) की सुरक्षा को लेकर तनाव चरम पर है। टीएमसी कार्यकर्ताओं ने ईवीएम में हेरफेर की आशंका जताते हुए भारी विरोध प्रदर्शन किया है। अगले 48 घंटों में आने वाले नतीजों से पहले, पूरा बंगाल एक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है।
“जनता दीदी के साथ है”: ममता बनर्जी ने अनुमानों को नकारा
विभिन्न समाचार चैनलों पर प्रसारित एग्जिट पोल—जिनमें से कई ने कांटे की टक्कर या विपक्ष को मामूली बढ़त दिखाई है—के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास से एक कड़ा बयान जारी किया।
मुख्यमंत्री ने कहा, “ये एग्जिट पोल जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। बंगाल की जनता ‘दीदी’ के साथ मजबूती से खड़ी है और 2026 में टीएमसी एक ऐसी रिकॉर्ड जीत दर्ज करेगी जो सभी विरोधियों का मुंह बंद कर देगी।”
पार्टी के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ’ब्रायन और महुआ मोइत्रा ने भी इस सुर में सुर मिलाते हुए इन सर्वेक्षणों को “मनोवैज्ञानिक युद्ध” का हिस्सा बताया। मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे इन आंकड़ों से निराश न हों, और 2021 के परिणामों की याद दिलाई जब एग्जिट पोल पूरी तरह गलत साबित हुए थे।
स्ट्रॉन्ग रूम विवाद: ईवीएम सुरक्षा पर रार
इस चुनाव के बाद सबसे संवेदनशील मुद्दा स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा को लेकर बना हुआ है। कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम के बाहर टीएमसी समर्थकों ने यह आरोप लगाते हुए हंगामा किया कि ईवीएम रखने वाली जगह के आसपास “अनधिकृत हलचल” देखी गई है।
एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, ममता बनर्जी खुद स्ट्रॉन्ग रूम पहुंचीं और वहां तैनात चुनाव अधिकारियों से सुरक्षा प्रोटोकॉल पर तीखे सवाल किए। भाजपा ने इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा है कि टीएमसी अपनी संभावित हार के लिए पहले से ही बहाने ढूंढ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 2 मई को मतगणना के दौरान कोई भी विसंगति सामने आती है, तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है, जिससे नई सरकार के गठन में देरी की संभावना बढ़ जाएगी।
डिजिटल युद्ध: विज्ञापन पर भारी खर्च
2026 का यह चुनाव केवल रैलियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी जबरदस्त तरीके से लड़ा गया। गूगल और मेटा (फेसबुक) के पारदर्शिता आंकड़ों के अनुसार, टीएमसी ने 15 मार्च से 27 अप्रैल 2026 के बीच डिजिटल विज्ञापनों पर लगभग ₹14.59 करोड़ खर्च किए।
पार्टी की रणनीति पूरी तरह से ‘बंगाल की बेटी’ के नैरेटिव पर केंद्रित थी। सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की महिला मतदाताओं को लक्षित किया गया, जो लंबे समय से ममता बनर्जी का मुख्य आधार रही हैं।
दक्षिण में झटका: केरल इकाई में बिखराव
एक तरफ टीएमसी बंगाल में अपना किला बचाने में जुटी है, वहीं पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार के सपनों को केरल में बड़ा झटका लगा है। टीएमसी की केरल इकाई के राज्य संयोजक पीवी अनवर ने 29 अप्रैल को पार्टी से इस्तीफा दे दिया।
अनवर का आरोप है कि केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें भाजपा का विरोध करने के लिए कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से रोका। उनके इस्तीफे के बाद केरल में टीएमसी का ढांचा पूरी तरह बिखर गया है, क्योंकि उन्होंने अब अपनी नई क्षेत्रीय पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है।
कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला: टीएमसी की मांग खारिज
मतगणना की निष्पक्षता को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। टीएमसी ने एक याचिका दायर कर मांग की थी कि मतगणना प्रक्रिया में केवल राज्य सरकार के कर्मचारियों को ही तैनात किया जाए।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मतगणना कर्मचारियों का चयन केवल राज्य कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग अपनी जरूरत के हिसाब से केंद्रीय कर्मचारियों या अन्य कर्मचारियों की ड्यूटी लगा सकता है। इसे टीएमसी के लिए एक प्रशासनिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
72 घंटे का निर्णायक समय
पश्चिम बंगाल के लिए अगले 72 घंटे बेहद महत्वपूर्ण हैं। 2 मई को होने वाली मतगणना न केवल 294 सीटों का फैसला करेगी, बल्कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी संस्थाओं की विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगी। ईवीएम सुरक्षा पर अदालती सुनवाई की संभावना और 2 मई के परिणामों के बीच, 2026 का यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक के रूप में दर्ज होने जा रहा है।



