
जैसे-जैसे वैश्विक समुदाय 22 अप्रैल, 2026 को ‘पृथ्वी दिवस’ (Earth Day) की 56वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है, भारत देशव्यापी स्तर पर पर्यावरण जागरूकता के लिए पूरी तरह तैयार है। राष्ट्रीय राजधानी में मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र (NSC), प्रगति मैदान में आयोजित होने वाला एक व्यापक शैक्षिक कार्यक्रम है। वर्ष 2026 की वैश्विक थीम, “अवर पावर, अवर प्लैनेट” (Our Power, Our Planet) के तहत आयोजित यह कार्यक्रम जलवायु विज्ञान और जमीनी स्तर के प्रयासों के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास करता है, जिसमें विशेष रूप से युवाओं को भविष्य की स्थिरता के मुख्य चालक के रूप में लक्षित किया गया है।
वर्ष 2026 का विषय “अवर पावर, अवर प्लैनेट” पर्यावरण चर्चा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। जहाँ पिछले वर्षों में संस्थागत जवाबदेही पर भारी ध्यान दिया गया था, वहीं 2026 का अभियान इस बात पर जोर देता है कि प्रणालीगत परिवर्तन अटूट रूप से व्यक्तिगत विकल्पों से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने और एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक (Single-use plastics) के उन्मूलन के लिए देश भर के स्कूलों और संस्थानों को वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान की है।
‘श्वेत महाद्वीप’ का विज्ञान और अंटार्कटिका
राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण “अंटार्कटिक अन्वेषण: श्वेत महाद्वीप की यात्रा” (Antarctic Exploration: Journey to the White Continent) विषय पर एक लोकप्रिय विज्ञान व्याख्यान है। यह सत्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अंतरिक्ष विभाग के विशिष्ट प्रोफेसर डॉ. अमिताव सेन गुप्ता द्वारा संचालित किया जाएगा। सुबह 10:00 बजे निर्धारित यह व्याख्यान ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत के चल रहे शोध प्रयासों की एक दुर्लभ झलक प्रदान करेगा।
डॉ. सेन गुप्ता, जिनका कार्य अक्सर वैश्विक जलवायु निगरानी से जुड़ा रहा है, अंटार्कटिका के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और दुनिया के “क्लाइमेट थर्मोस्टेट” के रूप में इसकी भूमिका पर चर्चा करेंगे। वे इस बात पर प्रकाश डालेंगे कि कैसे अंटार्कटिक बर्फ की चादर में बदलाव वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि के लिए शुरुआती चेतावनी के संकेत के रूप में कार्य करते हैं—जो भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के लिए अत्यंत चिंता का विषय है।
डॉ. सेन गुप्ता ने कार्यक्रम से पहले अपने संदेश में कहा, “अंटार्कटिका में जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के भविष्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण सुराग छिपे हैं। भारती और मैत्री [भारत के अनुसंधान केंद्र] के लिए हमारे मिशन केवल अन्वेषण के बारे में नहीं हैं; वे हमारे ग्रह के वायुमंडलीय और भूवैज्ञानिक इतिहास को डिकोड करने के बारे में हैं ताकि हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए आने वाली चुनौतियों का सटीक अनुमान लगा सकें।”
अगली पीढ़ी की भागीदारी
मुख्य व्याख्यान के बाद, राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र सुबह 11:00 बजे एक ‘ओपन हाउस क्विज’ (Open House Quiz) प्रतियोगिता के माध्यम से इंटरैक्टिव लर्निंग पर ध्यान केंद्रित करेगा। स्कूली छात्रों और विज्ञान प्रेमियों के लिए तैयार की गई इस प्रश्नोत्तरी में जैव विविधता, संसाधन की कमी और अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों सहित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल होगी।
राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के शिक्षा अधिकारी दिनेश मलिक ने इस प्रकार की प्रतिस्पर्धी शिक्षण प्रणालियों के महत्व पर जोर दिया। श्री मलिक ने कहा, “इंटरैक्टिव लर्निंग के माध्यम से छात्रों को जोड़ना स्थिरता (Sustainability) के बारे में दीर्घकालिक जागरूकता पैदा करने की कुंजी है। हम केवल यह नहीं चाहते कि वे तथ्यों को याद रखें; हम चाहते हैं कि वे उस ‘शक्ति’ (Power) को समझें जो उनकी दैनिक आदतों में निहित है—चाहे वह ऊर्जा की खपत हो या कचरा प्रबंधन।”
संदर्भ: 2026 में भारत के जलवायु लक्ष्य
पृथ्वी दिवस समारोह भारत की पर्यावरण नीति के लिए एक महत्वपूर्ण समय पर आया है। मार्च 2026 के अंत में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र को सौंपे जाने वाले अपडेटेड ‘नेशनली डिटरमाइंड कॉन्ट्रिब्यूशन’ (NDC) को मंजूरी दी थी। भारत ने 2005 के स्तर से 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता को 47% तक कम करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
इसके अलावा, अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति समय से आगे रही है। फरवरी 2026 तक, देश ने 52.57% गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता हासिल कर ली है, जिससे उसने अपना पिछला 2030 का लक्ष्य पांच साल पहले ही पूरा कर लिया है। सरकार ने अब 2035 तक 60% हिस्सेदारी का नया लक्ष्य निर्धारित किया है। राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र जैसे आयोजन इन व्यापक नीतियों को सार्वजनिक मंच प्रदान करते हैं।
वैश्विक महत्व और स्थानीय कार्रवाई
पृथ्वी दिवस की शुरुआत 1970 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक जमीनी आंदोलन के रूप में हुई थी और तब से यह 190 से अधिक देशों को शामिल करने वाला एक वैश्विक आंदोलन बन गया है। 2026 में, वैश्विक अभियान विशेष रूप से “अक्षय ऊर्जा, पुनः बहाल ग्रह” पर केंद्रित है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत की भूमिका अपनी अनूठी जनसांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रमुख जलवायु शोधकर्ता अवंतिका गोस्वामी ने कहा कि वैश्विक उत्सर्जन में अपने न्यूनतम ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए भारत अपनी क्षमता से “कहीं अधिक कार्य” कर रहा है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करते हुए उच्च जीडीपी विकास दर को बनाए रखना इस दशक की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भागीदारी और पहुंच
प्रगति मैदान का यह कार्यक्रम आम जनता के लिए खुला है, जिसमें संस्कृति मंत्रालय के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार ‘आकांक्षी ब्लॉकों’ और सीमावर्ती क्षेत्रों के छात्रों पर विशेष जोर दिया गया है। राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र ने अपनी शैक्षिक सामग्रियों में पहुंच संबंधी सुविधाओं (Accessibility features) को भी एकीकृत किया है ताकि दिव्यांग छात्र भी वैज्ञानिक प्रदर्शनों में पूरी तरह भाग ले सकें। 22 अप्रैल को जैसे ही राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र के द्वार खुलेंगे, संदेश स्पष्ट होगा: ग्रह को बचाने का विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है; यह एक साझा जिम्मेदारी है जो व्यक्ति से शुरू होती है।
पृथ्वी दिवस 2026 कार्यक्रम केवल एक वार्षिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक अनुस्मारक है कि सामूहिक कार्रवाई ही पर्यावरण की स्थिरता की आधारशिला है। विशेषज्ञ ज्ञान और इंटरैक्टिव शिक्षा को जोड़कर, यह आयोजन अगली पीढ़ी को ग्रह की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है।




