
मौसम विभाग की चेतावनी: सामान्य से कम बारिश और सूखे का बढ़ा खतरा
प्रशांत महासागर में तेजी से उभर रहे ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Niño) के कारण भारत में इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के कमजोर रहने का एक गंभीर संकट मंडरा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी दीर्घकालिक मौसमी पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के दौरान देश में कुल बारिश सामान्य से केवल 92 प्रतिशत (92%) तक ही रहने की संभावना है। इस विपरीत मौसमी बदलाव के कारण देश में सामान्य से काफी कम बारिश (Deficient Monsoon) होने का खतरा बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो कि ऐतिहासिक रूप से रहने वाले 16 प्रतिशत के औसत से दोगुने से भी अधिक है।
मात्रात्मक अनुमानों के अनुसार, भारत में मॉनसून के दौरान सामान्यतः लगभग 870 मिलीमीटर (मीमी) बारिश दर्ज की जाती है, जिसके इस बार घटकर केवल 800 मीमी के आसपास रह जाने की आशंका है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मॉनसून इस बार समय से थोड़ा पहले, यानी लगभग 26 मई के आसपास केरल के तट पर दस्तक दे सकता है। लेकिन इस शुरुआती गति के बावजूद, अल नीनो का वास्तविक और विनाशकारी प्रभाव अगस्त और सितंबर के महीनों में देखने को मिलेगा, जब देश के कई हिस्सों में लंबे समय तक शुष्क दौर (Dry Spells) यानी बिना बारिश के सूखे जैसे हालात बन सकते हैं।
अल नीनो क्या है और यह भारतीय मॉनसून को कैसे प्रभावित करता है?
अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) एक वैश्विक जलवायु पैटर्न है, जो केंद्रीय और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी के कारण उत्पन्न होता है। सामान्य परिस्थितियों में, मजबूत व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं, जो समुद्र के गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं। लेकिन अल नीनो के चरण में, ये हवाएं कमजोर हो जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी पूर्व की ओर बढ़ने लगता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के लिए, समुद्र के तापमान में होने वाला यह बदलाव मॉनसून को आगे बढ़ाने वाली हवाओं के चक्र को पूरी तरह से बाधित कर देता है। प्रशांत महासागर में अत्यधिक गर्मी के कारण एक मजबूत कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है, जो हिंद महासागर से नमी से भरी हवाओं को अपनी ओर खींच लेता है। इसके परिणामस्वरूप भारत की ओर आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। साल 2026 का यह अल नीनो चक्र इतना तीव्र है कि मौसम वैज्ञानिक इसके तापमान में 3% तक की बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहे हैं, जिसकी तुलना वर्ष 1997 और 2015 के ऐतिहासिक और विनाशकारी सूखा काल से की जा रही है।
क्षेत्रीय प्रभाव: उत्तर-मध्य भारत में सूखा और दक्षिण में बाढ़ का अलर्ट
मौसम विभाग के अनुसार, इस साल बारिश की कमी का प्रभाव पूरे देश पर एक समान नहीं रहेगा, बल्कि इसका क्षेत्रीय वितरण काफी असमान होने की आशंका है। देश के मुख्य कृषि प्रधान क्षेत्रों — उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भारत पर इस सूखे का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के एक बड़े हिस्से (जिसमें इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर जैसे प्रमुख कृषि संभाग शामिल हैं) में बारिश की भारी कमी हो सकती है। इससे इन राज्यों में धान, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी खरीफ की मुख्य फसलों की बुवाई और पैदावार पर संकट गहरा गया है।
इसके विपरीत, सुपर अल नीनो के अजीबोगरीब और अनियंत्रित चक्र के कारण दक्षिणी प्रायद्वीप के तटीय इलाकों में एक अलग तरह का खतरा मंडरा रहा है। जहां एक तरफ देश के उत्तरी और मध्य भाग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ तटीय तमिलनाडु (विशेष रूप से चेन्नई) और तटीय आंध्र प्रदेश में मॉनसून के उत्तरार्ध में अत्यधिक भारी बारिश और अचानक बाढ़ (Flash Floods) आने की गंभीर चेतावनी जारी की गई है। एक ही समय में सूखे और बाढ़ की यह दोहरी चुनौती राज्य सरकारों के आपदा प्रबंधन विभागों के लिए एक परीक्षा साबित होगी।
आर्थिक प्रभाव: ग्रामीण भारत पर मार और खाद्य मुद्रास्फीति का खतरा
भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जनजीवन आज भी काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। देश के लगभग 60 प्रतिशत (60%) किसान सिंचाई के आधुनिक साधनों के अभाव में पूरी तरह से मानसूनी वर्षा के भरोसे ही खेती करते हैं। ऐसे में बारिश में 8 से 10 प्रतिशत की मामूली कमी भी फसलों के उत्पादन को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है, जिससे किसानों की आय में गिरावट आती है और ग्रामीण बाज़ारों में मांग कमजोर पड़ जाती है।
व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से, यदि मॉनसून 92 प्रतिशत से नीचे रहता है, तो देश में खाद्य पदार्थों की महंगाई (Food Inflation) बढ़ने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाएगा। कृषि उपज में कमी आने से दालों, तिलहन और अनाज की कीमतों में उछाल आ सकता है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार को फसलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने और विदेशों से महंगे दामों पर खाद्यान्न आयात करने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि खाद्य सुरक्षा पर दबाव बढ़ता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाएगा, जिसका सीधा असर देश की औद्योगिक विकास दर पर पड़ेगा।
वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का दृष्टिकोण
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि वैश्विक मॉडल प्रशांत महासागर में एक गंभीर अल नीनो की पुष्टि कर रहे हैं, लेकिन मॉनसून के अंतिम महीनों में हिंद महासागर में बनने वाली परिस्थितियां कुछ हद तक राहत प्रदान कर सकती हैं। वैज्ञानिक ‘हिंद महासागर द्विध्रुव’ (Indian Ocean Dipole – IOD), जिसे ‘भारतीय नीनो’ भी कहा जाता है, के सकारात्मक होने की उम्मीद जता रहे हैं, जो अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को थोड़ा कम कर सकता है।
भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के तापीय बदलावों पर शोध कर रहे विख्यात जलवायु वैज्ञानिक डॉ. माधवने नायर ने इस गंभीर स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा, “प्रशांत महासागर का तापमान बेहद चिंताजनक गति से बढ़ रहा है, जो यह स्पष्ट संकेत देता है कि इस साल का अल नीनो 1997 और 2015 की तरह ही अत्यधिक तीव्र और विनाशकारी हो सकता है। हालांकि मई के अंत में मॉनसून का जल्दी आना शुरुआती बुवाई के लिए अच्छा है, लेकिन अगस्त और सितंबर के महीनों में आने वाले लंबे शुष्क दौर हमारी कृषि व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा लेंगे। इस संकट से निपटने के लिए हमें तत्काल प्रभाव से जल प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जलाशयों के पानी का विवेकपूर्ण उपयोग और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों (Drip Irrigation) को अपनाकर ही हम इस मौसमी घाटे को एक बड़े आर्थिक संकट में बदलने से रोक सकते हैं।”
संकट से निपटने की रणनीतियाँ और प्रशासनिक तैयारियाँ
इस संभावित कृषि संकट को देखते हुए, केंद्रीय कृषि मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारें अभी से रक्षात्मक कदम उठा रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे इस साल पारंपरिक फसलों के बजाय कम समय में तैयार होने वाली और कम पानी चाहने वाली सूखा-प्रतिरोधी (Drought-Resistant) फसलों की बुवाई करें। इसके साथ ही, बुवाई के समय को थोड़ा आगे-पीछे करने का सुझाव दिया जा रहा है ताकि फसलों को अगस्त के शुष्क दौर के नुकसान से बचाया जा सके।
प्रशासनिक स्तर पर, ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा दिया जा रहा है और घटते भूजल स्तर को देखते हुए पानी के अत्यधिक दोहन पर कड़े नियम लागू किए जा रहे हैं। आधुनिक विज्ञान, सटीक मौसम पूर्वानुमान और समय रहते किए गए नीतिगत सुधारों के समन्वय से भारत का प्रयास इस वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना और देश की खाद्य सुरक्षा को अक्षुण्ण बनाए रखना है।




