तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने गुरुवार को एक तीखे बयान में, जो राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में गूंज रहा है, दावा किया कि अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले लोकतांत्रिक समाज में मौलिक रूप से “अस्वीकार्य” हैं। विभिन्न राज्यों में हाल की घटनाओं की एक श्रृंखला पर प्रकाश डालते हुए, मुख्यमंत्री ने दंगाइयों पर लगाम लगाने के लिए “दृढ़ संकल्प” का आह्वान किया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को सभी प्रशासनिक और सामाजिक हितधारकों के लिए एक साझा और तत्काल कर्तव्य बताया।
मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी जबलपुर, रायपुर और मणिपुर में जारी जटिलताओं जैसे क्षेत्रों में व्यवधान और कथित लक्षित हिंसा की रिपोर्टों के बाद बढ़ी हुई संवेदनशीलता के समय आई है। स्टालिन ने इस बात पर जोर दिया कि बहुसंख्यक आबादी का असली चरित्र उसके प्रभुत्व से नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों को बिना किसी डर के रहने की क्षमता सुनिश्चित करने से परिभाषित होता है।
एक विचलित करने वाला विरोधाभास
स्टालिन ने वर्तमान राजनीतिक माहौल में एक विरोधाभास की ओर इशारा किया। उन्होंने नोट किया कि जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रिसमस समारोहों में भाग लिया—जो कि अल्पसंख्यकों तक पहुंचने का एक प्रयास था—वहीं दूसरी ओर दक्षिणपंथी हिंसक समूहों द्वारा हमलों में शामिल होने की खबरें आती रहीं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में स्टालिन ने कहा, “जब बहुसंख्यक के नाम पर काम करने वाले कुछ दक्षिणपंथी हिंसक समूह हमलों और दंगों में लिप्त होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री क्रिसमस समारोह में भाग लेते हैं, तो यह राष्ट्र को एक विचलित करने वाला संदेश भेजता है।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि यदि इन कार्रवाइयों को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो ये देश के संवैधानिक ढांचे को कमजोर करेंगी।
मुख्यमंत्री ने केंद्र में वर्तमान प्रशासन के कार्यभार संभालने के बाद से अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों (Hate Speech) में “74 प्रतिशत की वृद्धि” का उल्लेख किया। अंतरराष्ट्रीय निगरानीकर्ताओं और घरेलू नागरिक समाज समूहों के आंकड़ों के अनुसार, उकसाने वाली बयानबाजी के मामलों में काफी तेजी आई है, जिसे स्टालिन ने भारत की बहुलवादी पहचान के लिए “आगे गंभीर खतरे” के संकेत के रूप में वर्णित किया।
पृष्ठभूमि: बढ़ती दरार
मणिपुर में लंबे समय से चली आ रही जातीय हिंसा के बाद सांप्रदायिक सद्भाव पर ध्यान केंद्रित करना राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन गया है। पूर्वोत्तर राज्य में मई 2023 में शुरू हुई अशांति ने धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर व्यापक राष्ट्रीय बहस के लिए उत्प्रेरक का काम किया है।
हाल के हफ्तों में, मध्य प्रदेश के जबलपुर और छत्तीसगढ़ के रायपुर से आई रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि कुछ समूहों ने धार्मिक सभाओं और सामाजिक कार्यक्रमों में व्यवधान डाला है। इन घटनाओं को, हालांकि स्थानीय अधिकारियों द्वारा अक्सर अलग-थलग कानून-व्यवस्था के मुद्दों के रूप में वर्णित किया जाता है, विपक्षी नेताओं द्वारा डराने-धमकाने के एक व्यवस्थित पैटर्न के रूप में देखा जाता है।
विशेषज्ञ की राय और वैश्विक संदर्भ
मानवाधिकार अधिवक्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने स्टालिन की चिंताओं को दोहराते हुए कहा है कि नफरत भरे भाषणों का “सामान्यीकरण” अक्सर शारीरिक हिंसा से पहले होता है।
सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की वरिष्ठ फेलो डॉ. अरुणा विश्वनाथन ने बढ़ते तनाव पर टिप्पणी की: “लोकतंत्र का स्वास्थ्य उसके सबसे कमजोर नागरिकों की सुरक्षा से मापा जाता है। जब राज्य नफरत फैलाने वालों के खिलाफ निर्णायक रूप से कार्य करने में विफल रहता है, तो यह प्रभावी रूप से उन्हें दूसरों के अधिकारों पर नियंत्रण प्रदान करता है। मुख्यमंत्री स्टालिन का ‘दृढ़ संकल्प’ का आह्वान एक आवश्यक अनुस्मारक है कि सांप्रदायिक विखंडन के खिलाफ प्रशासनिक तटस्थता ही एकमात्र सुरक्षा कवच है।”
आगे का रास्ता
स्टालिन का संदेश केवल एक आलोचना नहीं बल्कि कार्रवाई का आह्वान था। उन्होंने आग्रह किया कि समाज को विभाजित करने वाली ताकतों से बचाने के कर्तव्य को दलीय दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दोहराया, “समाज को विभाजित करने वाले दंगाई समूहों पर लगाम लगाना एक साझा और तत्काल कर्तव्य है,” और सुझाव दिया कि जनता का विश्वास बहाल करने के लिए राज्य और केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर काम करना चाहिए।
