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पूर्व CJ टीएस शिवगणनम का इस्तीफा: बंगाल में चुनावी सूची विवाद गहराया

In Politics
May 08, 2026
पूर्व CJ टीएस शिवगणनम का इस्तीफा बंगाल में चुनावी सूची विवाद गहराया - RajneetiGuru.com

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस टीएस शिवगणनम ने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब राज्य हाल ही में संपन्न हुए 2026 विधानसभा चुनावों के परिणामों और मतदाता सूची से 90 लाख नाम हटाए जाने के विवाद से जूझ रहा है।

जस्टिस शिवगणनम, जिन्होंने सितंबर 2025 में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया था, उन 19 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से एक थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मतदाता सूची से हटाए गए नामों की अपीलों पर सुनवाई के लिए नियुक्त किया गया था।

इस्तीफे के पीछे की कड़वी सच्चाई

जस्टिस शिवगणनम ने अपना इस्तीफा कलकत्ता हाई कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल को सौंपा। हालांकि इस्तीफे का औपचारिक कारण “व्यक्तिगत” बताया गया है, लेकिन उनके बयान ट्रिब्यूनल के भीतर व्याप्त संसाधनों की कमी और भारी काम के बोझ की ओर इशारा करते हैं।

5 अप्रैल से 27 अप्रैल के बीच, जस्टिस शिवगणनम ने कोलकाता और उत्तर 24 परगना के मामलों की सुनवाई करते हुए 1,777 अपीलों का निपटारा किया। उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की नन, प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और कांग्रेस उम्मीदवार महताब शेख जैसे कई लोगों के मतदान के अधिकार बहाल किए।

लेकिन जस्टिस शिवगणनम ने चेतावनी दी कि जिस गति से काम चल रहा है, उससे केवल कोलकाता की लंबित अपीलों को निपटाने में ही चार साल लग जाएंगे। “मैने बिना किसी स्टाफ के रविवार को भी सुबह 8:30 से शाम 5:00 बजे तक काम किया, फिर भी कोलकाता में अभी 1 लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं,” जस्टिस टीएस शिवगणनम ने कहा। “ऑनलाइन पोर्टल पर शब्द सीमा की पाबंदी और तकनीकी बाधाएं काम को और भी मुश्किल बना रही हैं।”

विवाद की जड़: 90 लाख नामों का विलोपन

यह पूरा विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुआ था, जब भारत निर्वाचन आयोग ने ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के तहत पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से 90.66 लाख नाम हटा दिए थे। आयोग का तर्क था कि यह सूची के ‘शुद्धिकरण’ का हिस्सा है, लेकिन विपक्षी दलों—विशेषकर टीएमसी (TMC) और कांग्रेस—ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया। आरोप लगाया गया कि लाखों वैध मतदाताओं को प्रक्रियागत खामियों के कारण बाहर कर दिया गया। जब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा, तो कोर्ट ने इन अपीलों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल गठित करने का आदेश दिया।

व्यवस्थागत खामियां और न्यायिक दबाव

जस्टिस शिवगणनम के इस्तीफे ने ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं:

  • तकनीकी चुनौतियां: जजों को विस्तृत आदेश लिखने की आदत होती है, लेकिन ई-पोर्टल पर शब्द सीमा के कारण उन्हें छोटे आदेश लिखने पड़ रहे हैं।

  • संसाधनों का अभाव: जजों के पास सहायक कर्मचारियों (Staff) की भारी कमी है, जिससे उन्हें फाइलिंग और डेटा अपलोडिंग जैसे काम भी खुद देखने पड़ रहे हैं।

  • तकनीकी दक्षता: सेवानिवृत्त जजों में से सभी ई-कोर्ट की प्रक्रियाओं में उतने सहज नहीं हैं, जिससे मामलों के निपटारे की गति धीमी हो रही है।

राजनीतिक हलचल और भविष्य के सवाल

जस्टिस शिवगणनम का इस्तीफा पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों के ठीक बाद आया है, जिसमें बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है और ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत किया है। तृणमूल कांग्रेस पहले से ही मतदाता सूची विवाद को अपना मुख्य मुद्दा बना रही थी, और अब इस इस्तीफे को वे अपनी शिकायतों के प्रमाण के रूप में पेश कर सकते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोलकाता और उत्तर 24 परगना के हज़ारों लंबित मामलों का क्या होगा? जस्टिस शिवगणनम चेन्नई वापस लौट रहे हैं, लेकिन उनके पीछे छूटा यह ‘न्यायिक शून्यता’ उन लाखों लोगों के भविष्य को अनिश्चित बना रही है जिनके वोट देने के अधिकार पर अभी फैसला होना बाकी है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत हस्तक्षेप कर नए न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं की, तो यह प्रक्रिया अनिश्चित काल के लिए खिंच सकती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है।

Author

  • Anup Shukla

    अनूप शुक्ला पिछले तीन वर्षों से समाचार लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे मुख्य रूप से समसामयिक घटनाओं, स्थानीय मुद्दों और जनता से जुड़ी खबरों पर गहराई से लिखते हैं। उनकी लेखन शैली सरल, तथ्यपरक और पाठकों से जुड़ाव बनाने वाली है।

    अनूप का मानना है कि समाचार केवल सूचना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और जागरूकता फैलाने का माध्यम है। यही वजह है कि वे हर विषय को निष्पक्ष दृष्टिकोण से समझते हैं और सटीक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं।

    उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और जनसमस्याओं जैसे कई विषयों पर प्रकाश डाला है।
    उनके लेख न सिर्फ घटनाओं की जानकारी देते हैं, बल्कि उन पर विचार और समाधान की दिशा भी सुझाते हैं।

    राजनीतिगुरु में अनूप शुक्ला की भूमिका है —

    स्थानीय और क्षेत्रीय समाचारों का विश्लेषण,

    ताज़ा घटनाओं पर रचनात्मक रिपोर्टिंग,

    जनसरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन,

    रुचियाँ: लेखन, यात्रा, फोटोग्राफी और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा।

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अनूप शुक्ला पिछले तीन वर्षों से समाचार लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे मुख्य रूप से समसामयिक घटनाओं, स्थानीय मुद्दों और जनता से जुड़ी खबरों पर गहराई से लिखते हैं। उनकी लेखन शैली सरल, तथ्यपरक और पाठकों से जुड़ाव बनाने वाली है।अनूप का मानना है कि समाचार केवल सूचना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और जागरूकता फैलाने का माध्यम है। यही वजह है कि वे हर विषय को निष्पक्ष दृष्टिकोण से समझते हैं और सटीक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं।उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और जनसमस्याओं जैसे कई विषयों पर प्रकाश डाला है। उनके लेख न सिर्फ घटनाओं की जानकारी देते हैं, बल्कि उन पर विचार और समाधान की दिशा भी सुझाते हैं।राजनीतिगुरु में अनूप शुक्ला की भूमिका है —स्थानीय और क्षेत्रीय समाचारों का विश्लेषण,ताज़ा घटनाओं पर रचनात्मक रिपोर्टिंग,जनसरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन,रुचियाँ: लेखन, यात्रा, फोटोग्राफी और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा।

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