
भारत में खेती के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एग्रीवोल्टेइक्स एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रहा है। इस तकनीक के तहत एक ही जमीन पर फसल उगाने और बिजली बनाने के लिए सोलर पैनल लगाए जाते हैं। इससे जमीन का बेहतर उपयोग करने, किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने और स्वच्छ ऊर्जा की ओर देश के संक्रमण को गति देने में मदद मिल सकती है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत की लगभग 46.1 प्रतिशत आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है। कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन (GVA) 2025-26 में 52.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में कृषि भूमि पर सौर ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं तलाशना ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र, दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत में कृषि भूमि पर सौर ऊर्जा की व्यापक संभावनाएं
भूमि उपयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत का रिपोर्टेड क्षेत्रफल 306.96 मिलियन हेक्टेयर था। इसमें लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा कृषि भूमि का था। देश का शुद्ध बोया गया क्षेत्र 138.99 मिलियन हेक्टेयर, जबकि कुल फसल क्षेत्र 217.88 मिलियन हेक्टेयर दर्ज किया गया।
एग्रीवोल्टेइक्स प्रणाली में सोलर पैनल फसलों की कतारों के ऊपर या उनके बीच लगाए जाते हैं। इससे बिजली उत्पादन के साथ खेती भी जारी रखी जा सकती है। फसल, पैनल की बनावट और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आंशिक छाया मिट्टी की नमी बनाए रखने और अत्यधिक गर्मी से फसलों को बचाने में मदद कर सकती है।
इस तकनीक से उत्पादित बिजली का इस्तेमाल सिंचाई पंपों और खेती से जुड़ी अन्य जरूरतों के लिए किया जा सकता है। अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में बेचकर किसान अपनी आय का नया स्रोत भी विकसित कर सकते हैं। इससे पारंपरिक बिजली और डीजल से चलने वाले पंपों पर निर्भरता घटाने की संभावना है।
देश में एग्रीवोल्टेइक्स की क्षमता कितनी है?
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के बैकग्राउंडर के अनुसार, अगस्त 2025 तक भारत में 37.54 मेगावाट की कुल स्थापित क्षमता वाली 36 एग्रीवोल्टेइक्स परियोजनाएं चालू थीं। इसके अतिरिक्त 10 पायलट परियोजनाएं विकास के चरण में थीं।
देश में एग्रीवोल्टेइक्स की अनुमानित क्षमता 3,000 गीगावाट से लेकर लगभग 14,000 गीगावाट तक बताई गई है। यह आंकड़ा कृषि उत्पादन के साथ बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा विकसित करने की संभावनाओं को दर्शाता है।
कुछ परिस्थितियों में आय के विविध स्रोत बनने से किसानों की सालाना कमाई लगभग 60,000 रुपये प्रति एकड़ से बढ़कर एक लाख रुपये से अधिक हो सकती है। हालांकि, वास्तविक आय फसल के चयन, स्थानीय परिस्थितियों, सोलर सिस्टम की बनावट और परियोजना की लागत पर निर्भर करेगी।
GIS आधारित राष्ट्रीय अध्ययन में पर्यावरणीय, कृषि संबंधी और तकनीकी मानकों को लागू करने के बाद 47.35 मिलियन हेक्टेयर प्रतिबंधित कृषि भूमि को एग्रीवोल्टेइक्स विकास के लिए उपयुक्त पाया गया। फलों, सब्जियों, मसालों और औषधीय पौधों को सोलर पैनलों के साथ उगाने के संभावित विकल्पों में शामिल किया गया है।
छह राज्यों में सबसे अधिक संभावनाएं
महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश को एग्रीवोल्टेइक्स के लिए उच्च क्षमता वाले राज्यों के रूप में पहचाना गया है। ये राज्य मिलकर भारत की अनुमानित एग्रीवोल्टेइक्स बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। कृषि भूमि की उपलब्धता, सौर संसाधन और अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियां इसकी प्रमुख वजहें हैं।
ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल में मध्यम क्षमता बताई गई है। इसके अलावा दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने की अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं।
एग्रीवोल्टेइक्स को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल
केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए नीतिगत उपायों, अनुसंधान, पायलट परियोजनाओं और वित्तीय सहायता पर काम कर रही है।
फरवरी 2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) योजना का उद्देश्य कृषि में सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करना, सिंचाई पंपों का सौरकरण करना और विकेंद्रीकृत बिजली उत्पादन को बढ़ावा देना है। योजना में लगभग 34,422 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान बताया गया है। इससे डीजल पर निर्भरता घटाने और किसानों के लिए आय के नए अवसर बनाने का लक्ष्य है।
राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने एग्रीवोल्टेइक्स पर अनुसंधान, प्रदर्शन और प्रशिक्षण के लिए एक उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किया है। इसके तहत भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में 100 किलोवाट की एग्रीवोल्टेइक्स प्रणाली शामिल है।
2023 में शुरू हुआ इंडिया एग्रीवोल्टेइक्स अलायंस, जिसका संचालन नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया के मार्गदर्शन में होता है, 40 से अधिक सदस्यों तक पहुंच चुका है। यह संगठन नीति निर्माण, अनुसंधान, पायलट परियोजनाओं और व्यावसायिक मॉडल विकसित करने पर काम करता है।
महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक की योजनाएं
महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0 के तहत लगभग 35,000 एकड़ सरकारी और निजी भूमि पर 16,000 मेगावाट की सौर परियोजनाएं विकसित करने की परिकल्पना है। इसका उद्देश्य कृषि उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति में सहायता देना है।
गुजरात की किसान सूर्योदय योजना कृषि कार्यों के लिए दिन के समय बिजली उपलब्ध कराने पर केंद्रित है। योजना में चरणबद्ध तरीके से सौर और अन्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों के जरिए सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक, यानी प्रतिदिन 16 घंटे तक बिजली आपूर्ति का लक्ष्य बताया गया है।
कर्नाटक की सूर्य रायथा योजना सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंपों को प्रोत्साहित करती है। इसके तहत किसान अतिरिक्त बिजली से भी आय अर्जित कर सकते हैं।
दिल्ली में आयोजित हो रहा वैश्विक एग्रीवोल्टेइक्स सम्मेलन
नई दिल्ली में 21 से 23 अक्टूबर 2026 तक सातवां एग्रीवोल्टेइक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस आयोजित किया जा रहा है। ‘पावरिंग द ग्लोबल साउथ’ विषय पर आधारित इस सम्मेलन में उद्योग, अनुसंधान, नीति निर्माण और वित्त क्षेत्र के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसका उद्देश्य खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को एक साथ आगे बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा करना है।
कुल मिलाकर, एग्रीवोल्टेइक्स भारत में कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण आय के नए अवसर विकसित करने का माध्यम बन सकता है। हालांकि, इसके सफल विस्तार के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, फसल के अनुसार पैनल डिजाइन, उपयुक्त भूमि का चयन और किसानों की भागीदारी जरूरी होगी, ताकि सौर ऊर्जा परियोजनाओं से खेती की उत्पादकता प्रभावित होने के बजाय उसे लाभ मिल सके।




