जैसे ही पश्चिम बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार हो रहा है, जो 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होंगे, चुनावी प्रक्रिया पर विशेष गहन संशोधन (SIR) के कारण पैदा हुए विवाद का असर साफ़ दिखाई दे रहा है। लगभग 60 लाख मतदाता “अधिवाद” (under adjudication) श्रेणी में रखे गए हैं, जिनकी मतदान पात्रता अभी तक निर्णायक रूप से तय नहीं हुई है, जिससे चुनावी माहौल जटिल और अस्थिर बन गया है।
निर्वाचन आयोग (ECI) ने आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची को अद्यतन और सुधराने के लिए SIR प्रक्रिया लागू की। यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृतक मतदाता और संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाकर सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से थी। हालांकि, करीब 60.06 लाख लोगों को “अधिवाद” में डाल दिया गया है, जिनकी वोटिंग पात्रता अब भी न्यायिक या प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ग्यानेश कुमार ने इस विवाद को स्वीकारते हुए मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि “हम यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी पात्र मतदाता अपने नाम के अन्यायपूर्ण हटाए जाने का शिकार न बने और चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें।”
विपक्षी दलों द्वारा SIR प्रक्रिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी गई है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की घोषणा की है, यह आरोप लगाते हुए कि कमीशन की कार्रवाई से अल्पसंख्यक समूह, महिलाएं, शरणार्थी और युवा मतदाता असमर्थित हो सकते हैं। CPI(M) नेता एमदीन सलीम ने कहा कि अधिवाद मामलों को संबोधित करने में विफलता लाखों मतदाताओं का हक़ छीने सकती है।
सुप्रीम कोर्ट भी सक्रिय रूप से इस मामले में हस्तक्षेप कर रहा है। उच्चतम न्यायालय ने मतदाता नाम कटौती के खिलाफ appeals सुनने के लिए ट्रिब्यूनल गठित करने और “संदिग्ध मतदाताओं” को शामिल करने का निर्णय न्यायिक आदेशों पर निर्भर करने का निर्देश दिया है।
SIR प्रक्रिया के कारण कई मतदाताओं में असमंजस और नाराज़गी भी बढ़ी है। कई जिलों में हजारों लोगों के नाम मतदाता सूची से हट गए या संदिग्ध श्रेणी में डाले गए, जिनके कारण पता न मिलना या सॉफ़्टवेयर द्वारा नाम की वर्तनी की त्रुटि जैसी समस्याएं बताई जा रही हैं। इन समस्याओं से कुछ समुदाय अधिक प्रभावित हुए हैं, जिससे निष्पक्षता को लेकर चर्चा तेज़ हुई है।
राजनीतिक रूप से, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विरोधी भारतीय जनता पार्टी (BJP) दोनों अपनी रणनीतियाँ आगे बढ़ा रहे हैं। TMC नेताओं ने इस प्रक्रिया को मनमाना और लक्षित करार देते हुए भाबनिपुर जैसे क्षेत्रों में मतदाता नामों की कटौती पर कड़ी आलोचना की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि उनकी निर्वाचन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं, जिससे लोकतंत्र को नुकसान पहुँच सकता है।
दूसरी ओर, BJP इसे मतदाता सूची की सफ़ाई बताते हुए समर्थन कर रहा है और कह रहा है कि यह अवैध मतदाताओं को हटाने में मदद करेगा। वरिष्ठ पार्टी नेताओं का कहना है कि कटौती और अधिवाद के बावजूद BJP पश्चिम बंगाल में अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाएगी।
यह विवाद 2026 के चुनावों के बेहद प्रतिस्पर्धी माहौल में आया है जब TMC और BJP के बीच राजनीतिक टक्कर तेज़ है। SIR सहायक मामलों का निपटारा, जो लाखों मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है, मतदाता turnout, पार्टी की ताकत और अंततः विधानसभा का स्वरूप निर्धारित कर सकता है।
चुनाव बस कुछ ही हफ्तों दूर हैं, और अधिवाद मामलों के निर्णय जनता, दलों और अधिकारियों के लिए निर्णायक होंगे। इस गहरे ध्रुवीकरण वाले माहौल में, इन अनसुलझे मतदाता मामलों के समाधान से न केवल चुनावी परिणाम बल्कि पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक भागीदारी की धारणा भी प्रभावित हो सकती है।
