बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों के दौरान एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सहयोगी भूमिका निभाने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) आज राज्य में गठबंधन की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बन चुकी है। इस बदलाव का सीधा असर जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू की राजनीतिक स्थिति पर पड़ा है, जो कभी बिहार में एनडीए का प्रमुख चेहरा मानी जाती थी।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह परिवर्तन धीरे-धीरे कई वर्षों में हुआ। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में बिहार की राजनीति में जेडीयू और उसके पूर्ववर्ती दलों का प्रभाव अधिक था। उस समय बीजेपी राज्य में अपेक्षाकृत छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में मौजूद थी। हालांकि समय के साथ संगठन विस्तार, चुनावी रणनीति और राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रभाव के कारण बीजेपी का जनाधार लगातार बढ़ता गया।
बिहार में बीजेपी के उभार को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद विशेष रूप से स्पष्ट रूप से देखा गया। उस चुनाव में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जीत मिली, जिसका प्रभाव बिहार की राजनीति पर भी पड़ा। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव और विभिन्न विधानसभा चुनावों में बीजेपी की सीटों और वोट प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि संगठनात्मक मजबूती और आक्रामक चुनावी अभियान बीजेपी के उभार के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। पार्टी ने राज्य में बूथ स्तर तक अपना संगठन मजबूत किया और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई।
इस बदलते समीकरण पर जेडीयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “हमारा उद्देश्य हमेशा विकास और सुशासन रहा है। गठबंधन में सभी दलों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि राज्य की प्रगति सुनिश्चित हो सके।”
हालांकि जेडीयू का राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी ने राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सड़क, शिक्षा और सामाजिक योजनाओं जैसे मुद्दों पर उनके शासन को कई समर्थक विकास मॉडल के रूप में भी देखते हैं।
इसके बावजूद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव के कारण जेडीयू के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। पहले जहां एनडीए में जेडीयू को प्रमुख सहयोगी के रूप में देखा जाता था, वहीं अब बीजेपी कई मामलों में गठबंधन की मुख्य ताकत बन गई है। इससे दोनों दलों के बीच शक्ति संतुलन में भी बदलाव आया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी की बढ़ती ताकत के बावजूद पार्टी के सामने भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। बिहार की सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय समीकरण और गठबंधन राजनीति ऐसे कारक हैं जो चुनावी रणनीति को जटिल बनाते हैं। राज्य में जातीय समीकरण और क्षेत्रीय नेतृत्व का प्रभाव अभी भी चुनावी परिणामों को काफी हद तक प्रभावित करता है।
वहीं जेडीयू के सामने अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। पार्टी को यह तय करना होगा कि वह गठबंधन राजनीति में अपनी भूमिका किस तरह बनाए रखे और बदलते राजनीतिक माहौल में अपना जनाधार कैसे मजबूत करे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति में गठबंधन समीकरण अक्सर बदलते रहे हैं। कभी सहयोगी रहे दल अलग हुए और फिर दोबारा साथ आए। ऐसे में आने वाले चुनावों में भी राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बिहार में बीजेपी का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो चुका है। इस बदलाव ने एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन को भी बदल दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू इस नई राजनीतिक स्थिति में अपनी रणनीति कैसे तय करती है और बीजेपी राज्य की राजनीति में अपनी बढ़त को किस तरह बनाए रखती है।
