तिरुवनंतपुरम — केरल की राजनीति में उस समय नया तूफान खड़ा हो गया जब विजिलेंस और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (VACB) ने विधानसभा में विपक्ष के नेता वी. डी. सतीशान के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की सिफारिश की। यह सिफारिश कथित रूप से विदेशी धन संग्रह से जुड़े मामलों और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के संभावित उल्लंघन को लेकर की गई है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सामने आए इस कदम ने राज्य में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है।
विवाद का संबंध 2018 की भीषण बाढ़ के बाद शुरू की गई एक पुनर्वास परियोजना से है, जिसका उद्देश्य प्रभावित परिवारों के लिए आवास और आजीविका की व्यवस्था करना था। यह परियोजना सतीशान के निर्वाचन क्षेत्र उत्तर परवूर में चलाई गई थी और इसके लिए विदेशों से दान राशि जुटाई गई थी। विजिलेंस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इस दौरान FCRA के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया और विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन के उपयोग व लेखा-जोखा में अनियमितताएं पाई गईं।
VACB का कहना है कि विदेशी फंड एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के माध्यम से जुटाया गया, लेकिन आवश्यक अनुमतियां और दस्तावेज पूरी तरह उपलब्ध नहीं थे। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि परियोजना से जुड़े कुछ लेन-देन पारदर्शी नहीं थे, जिसके चलते मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपने की सिफारिश की गई।
इस घटनाक्रम ने केरल की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं। कांग्रेस और UDF ने इस कदम को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया है कि चुनाव से पहले विपक्ष को कमजोर करने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। UDF नेताओं का कहना है कि इस मामले की पहले भी जांच हो चुकी है और उसमें किसी प्रकार का आपराधिक तत्व सामने नहीं आया था।
स्वयं सतीशान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, “मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा है। इस मामले की पहले जांच हो चुकी है और तब कोई उल्लंघन नहीं पाया गया था। अब इसे फिर से उठाना केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा लगता है।” उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी भी निष्पक्ष जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं।
दूसरी ओर, LDF का तर्क है कि मामला गंभीर है और इसमें कानून के संभावित उल्लंघन की बात सामने आई है, इसलिए CBI जैसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से जांच कराना उचित होगा। सत्तारूढ़ गठबंधन का कहना है कि जांच की सिफारिश को दोष सिद्ध होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है।
राज्य सरकार के सामने अब यह निर्णय लेने की चुनौती है कि क्या इस मामले को औपचारिक रूप से CBI को सौंपा जाए। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट का कानूनी और तकनीकी मूल्यांकन किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले विधानसभा चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है। जहां UDF इसे राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में पेश कर रहा है, वहीं LDF इसे पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले भी केरल में चुनावों के दौरान जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर बहस होती रही है।
पृष्ठभूमि में देखें तो FCRA कानून का उद्देश्य विदेशी धन के प्रवाह को विनियमित करना और यह सुनिश्चित करना है कि इसका उपयोग राष्ट्रीय हितों के खिलाफ न हो। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में कई संगठनों और व्यक्तियों के खिलाफ इस कानून के उल्लंघन के आरोपों पर जांच हुई है, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह मामला केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केरल की चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार के फैसले और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
