तेलंगाना में पशु क्रूरता की एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने पूरे देश को झकझोर दिया है। राज्य के कामारेड्डी और हनमकोंडा जिलों में “चुनावी वादों” को पूरा करने के नाम पर केवल एक सप्ताह के भीतर लगभग 500 आवारा कुत्तों को जहर देकर मार दिया गया। इस घटना ने जहाँ एक ओर पुलिस जांच को तेज कर दिया है, वहीं दूसरी ओर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के प्रबंधन में विफल रहने पर राज्य सरकारों को भारी जुर्माना लगाने की चेतावनी दी है।
सामूहिक संहार का पैमाना
पशु कल्याण कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह संहार सुनियोजित तरीके से किया गया।
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हनमकोंडा जिला: जनवरी के पहले सप्ताह में सायंपेट और आरेपल्ली गांवों में लगभग 300 कुत्तों को मारने का आरोप लगा, जिनमें से पुलिस ने अब तक 110 मौतों की पुष्टि की है।
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कामारेड्डी जिला: कार्यकर्ता अडुलापुरम गौतम की शिकायत के बाद पता चला कि भवानीपेट, पलवंचा और फरीदपेट सहित कई गांवों में लगभग 200 कुत्तों को जहर दिया गया।
“चुनावी वादों” की खूनी सच्चाई
जांच में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि यह हत्याएं पिछले साल दिसंबर में हुए ग्राम पंचायत चुनावों के दौरान किए गए वादों को पूरा करने के लिए की गईं। ग्रामीणों द्वारा आवारा कुत्तों के आतंक की शिकायतों के बाद, कई सरपंच उम्मीदवारों ने वादा किया था कि वे जीतने के बाद गांव को “कुत्ता मुक्त” कर देंगे। चुनाव जीतने के बाद, उन्होंने कानूनी नसबंदी प्रक्रियाओं का पालन करने के बजाय “शॉर्टकट” अपनाया और पेशेवर हत्यारों को काम पर लगा दिया।
पशु कल्याण पैनल की सदस्य गौरी मुलेखी ने कहा:
“यह कानून व्यवस्था का पूरी तरह से चरमराना है। सरपंच, जो गांव स्तर पर संवैधानिक अधिकारी हैं, वे खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और पशु जन्म नियंत्रण नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। कुत्तों को मारना कोई समाधान नहीं, बल्कि एक अपराध है।”
हत्या का तरीका: घातक इंजेक्शन और गोलियां
दोषियों ने कुत्तों को मारने के लिए क्रूर तरीकों का इस्तेमाल किया। हनमकोंडा में, कुत्तों को दूर से ही जहर से भरे इंजेक्शन लगाए गए, जिससे उनकी एक मिनट के भीतर मौत हो गई। वहीं कामारेड्डी में, कुत्तों को खाने में मिलाकर जहरीली गोलियां दी गईं। पुलिस ने शवों को जमीन से निकालकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा है और जहर के प्रकार का पता लगाने के लिए विसरा नमूने फॉरेंसिक लैब भेजे गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह राज्यों को कुत्ता काटने के मामलों में “भारी मुआवजा” देने का निर्देश देने पर विचार कर रहा है। अदालत ने अधिकारियों को एबीसी (ABC) नियमों को लागू करने में “पूरी तरह विफल” रहने के लिए फटकार लगाई।
निष्कर्ष
तेलंगाना की यह घटना मानव सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच बढ़ते संघर्ष का एक भयावह उदाहरण है। यह स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिए एक सबक है कि “वादे पूरे करना” उन्हें कानून से ऊपर नहीं बनाता। अब देखना यह है कि क्या न्यायपालिका की सख्ती राज्यों को मानवीय समाधान अपनाने पर मजबूर कर पाएगी।
