नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—SIR) को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद गहराता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक सांसद ने इस प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। सांसद ने दावा किया है कि अनधिकृत समीक्षा, संदिग्ध लॉग-इन गतिविधियाँ और अस्पष्ट दस्तावेजों के आधार पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है और 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है। इसके तुरंत बाद राज्य में विधानसभा चुनावों की घोषणा होने की संभावना है। ऐसे में यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से हटता है, तो उसके पास सुधार या अपील के लिए व्यावहारिक रूप से कोई समय नहीं बचेगा।
टीएमसी सांसद ने अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया कि कई मामलों में मतदाता सूची में बदलाव बिना समुचित सत्यापन के किए गए। याचिका के अनुसार, कुछ बूथ स्तर अधिकारियों के लॉग-इन विवरण कथित रूप से अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा उपयोग किए गए, जबकि कई मामलों में मतदाताओं से जुड़े दस्तावेज इतने अस्पष्ट थे कि उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि करना संभव नहीं था।
इस पूरे विवाद के केंद्र में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित एसआईआर प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य फर्जी या दोहराए गए नामों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध करना होता है। आयोग का कहना रहा है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी है और कानून के तहत की जाती है। हालांकि, विपक्षी दलों का तर्क है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की कवायद से वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने का खतरा बढ़ जाता है।
एक वरिष्ठ संवैधानिक विशेषज्ञ ने इस मुद्दे पर कहा, “मतदाता सूची लोकतंत्र की रीढ़ होती है। यदि किसी भी स्तर पर प्रक्रिया में जल्दबाज़ी या तकनीकी खामियाँ होती हैं, तो उसका सीधा असर नागरिकों के मताधिकार पर पड़ता है। चुनाव से ठीक पहले इस तरह की त्रुटियाँ विशेष रूप से चिंताजनक हैं।”
पृष्ठभूमि में देखें तो भारत में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कोई नई प्रक्रिया नहीं है। समय-समय पर निर्वाचन आयोग राज्यों में इस अभ्यास को लागू करता रहा है, ताकि मृत मतदाताओं, स्थानांतरित लोगों या फर्जी प्रविष्टियों को हटाया जा सके। लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में, जहाँ चुनाव अक्सर कड़े मुकाबले वाले होते हैं, इस प्रक्रिया पर अतिरिक्त निगरानी की मांग उठती रही है।
टीएमसी का आरोप है कि एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनमें बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक, अल्पसंख्यक समुदाय और शहरी गरीब शामिल हैं। पार्टी का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संभावित रूप से मतदाताओं को वंचित करने का मामला भी हो सकता है। वहीं, विपक्षी दलों ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है और कहा है कि शुद्ध मतदाता सूची सभी के हित में है।
सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए इस मुद्दे से अब यह स्पष्ट हो गया है कि चुनावी प्रक्रिया में तकनीक और प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अदालत से अपेक्षा की जा रही है कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम बिना उचित कारण और प्रक्रिया के मतदाता सूची से न हटे।
जैसे-जैसे अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने की तारीख नज़दीक आ रही है, इस मामले पर न्यायिक हस्तक्षेप का महत्व और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का रुख न केवल पश्चिम बंगाल, बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाले ऐसे पुनरीक्षण अभियानों के लिए भी एक नज़ीर स्थापित कर सकता है।
