चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी आर स्वामीनाथन के एक हालिया सार्वजनिक भाषण ने देश में न्यायपालिका की भूमिका, व्यक्तिगत आस्था और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह बहस ऐसे समय में सामने आई है, जब न्यायाधीश पहले से ही मदुरै में एक धार्मिक परंपरा से जुड़े अदालती आदेश को लेकर चर्चा में रहे हैं।
हाल ही में तमिलनाडु में आयोजित एक आध्यात्मिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने अपने व्यक्तिगत विश्वासों पर खुलकर बात की। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने तर्कवादियों की आलोचना करते हुए सामाजिक सुधारक और तर्कवादी विचारधारा के प्रतीक ई. वी. रामासामी पेरियार के शब्दों और शैली का उल्लेख किया। यह वही शब्दावली है, जिसे ऐतिहासिक रूप से रूढ़िवादी धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है।
न्यायाधीश ने कहा कि जो लोग गुरुओं या आध्यात्मिक आस्थाओं को मानने वालों का उपहास करते हैं और उन्हें अज्ञानी या पिछड़ा बताते हैं, वे स्वयं उसी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए यह भी कहा कि कठिन परिस्थितियों में उन्हें अपने गुरु की स्मृति से मानसिक और भावनात्मक बल मिला।
हालांकि यह बयान न्यायाधीश की निजी आस्था को दर्शाता है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणियाँ न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि को प्रभावित कर सकती हैं। उनका तर्क है कि न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे सार्वजनिक मंचों पर अपने निजी धार्मिक विचारों को व्यक्त करने में संयम बरतें, ताकि समाज के सभी वर्गों में न्यायिक निष्पक्षता पर भरोसा बना रहे।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायमूर्ति स्वामीनाथन पहले भी एक संवेदनशील मामले में अपने आदेश के कारण चर्चा में रहे हैं। मदुरै में एक धार्मिक स्थल के निकट पारंपरिक दीप प्रज्वलन की अनुमति देने वाले उनके आदेश ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया था। कुछ सांसदों और संगठनों ने उस आदेश को संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध बताया था।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में न्यायपालिका की भूमिका केवल न्याय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उसके कार्य और वक्तव्य किसी भी समुदाय या विचारधारा के प्रति झुकाव का आभास न दें। एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ के अनुसार, “न्यायपालिका की शक्ति केवल उसके निर्णयों में नहीं, बल्कि उस भरोसे में निहित होती है, जो जनता उसके प्रति रखती है। सार्वजनिक भाषण उस भरोसे को मजबूत भी कर सकते हैं और कमजोर भी।”
दूसरी ओर, कुछ वर्ग न्यायाधीश के समर्थन में भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो, अपनी व्यक्तिगत आस्था रखने और व्यक्त करने का अधिकार देता है। उनके अनुसार, जब तक न्यायाधीश के फैसलों में कोई स्पष्ट पक्षपात न हो, तब तक उनके निजी विचारों को विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह पूरा घटनाक्रम एक व्यापक सवाल खड़ा करता है—क्या एक न्यायाधीश अपने व्यक्तिगत विश्वासों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर सकता है, और यदि हाँ, तो उसकी सीमा क्या होनी चाहिए? भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता को मूल सिद्धांत माना गया है, और न्यायपालिका को उसका संरक्षक भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इस तरह की घटनाएँ न्यायिक आचरण से जुड़े दिशा-निर्देशों पर फिर से विचार की आवश्यकता को रेखांकित कर सकती हैं। स्पष्ट मानक न केवल न्यायाधीशों को मार्गदर्शन देंगे, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी सुदृढ़ करेंगे।
फिलहाल, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन का यह बयान कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बना हुआ है, और यह बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।
