मुंबई — महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच संबंध हमेशा से जटिल और बहुस्तरीय रहे हैं। जुलाई 2023 में जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता अजित पवार ने महायुति सरकार में शामिल होने का फैसला किया, तो यह केवल एक दल-बदल नहीं था, बल्कि सत्ता संतुलन और राजनीतिक यथार्थवाद का एक अहम उदाहरण माना गया। हालांकि, इस गठजोड़ के भीतर असहजता की एक धारा आज भी बनी हुई है, खासकर राज्य भाजपा के भीतर।
अजित पवार के महायुति में शामिल होने के समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे कहा था, “यह आपकी सही जगह है, लेकिन आप यहां आने में बहुत समय लगा बैठे।” यह टिप्पणी भाजपा नेतृत्व की उस सोच को दर्शाती है, जिसमें अजित पवार को लंबे समय से संभावित सहयोगी के रूप में देखा जाता रहा है। बावजूद इसके, महाराष्ट्र भाजपा के एक वर्ग में इस गठबंधन को लेकर संदेह और असंतोष बना हुआ है।
अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में एक प्रभावशाली और निर्णायक नेता माने जाते हैं। वे चार बार राज्य के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं और प्रशासनिक अनुभव के लिए जाने जाते हैं। एनसीपी संस्थापक शरद पवार के भतीजे होने के कारण उनकी राजनीतिक भूमिका हमेशा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रही है। 2019 में उनका संक्षिप्त लेकिन नाटकीय सत्ता प्रयोग और 2023 में एनसीपी विभाजन ने उन्हें एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में ला दिया।
भाजपा के लिए अजित पवार का साथ सत्ता की स्थिरता और संख्या बल के लिहाज से अहम रहा है। उनके साथ आए विधायकों ने सरकार को मजबूत आधार दिया, जिससे गठबंधन को विधानसभा में सहज बहुमत मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ वैचारिक समानता से अधिक राजनीतिक व्यावहारिकता पर आधारित है।
हालांकि, भाजपा के भीतर सभी नेता इस समीकरण से सहज नहीं हैं। पार्टी के कुछ पुराने नेताओं का मानना है कि अजित पवार की राजनीतिक शैली और पिछला रिकॉर्ड भाजपा की पारंपरिक राजनीति से मेल नहीं खाता। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह गठबंधन सत्ता के गणित के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इससे जमीनी कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति भी पैदा हुई है।”
दूसरी ओर, अजित पवार के लिए यह गठबंधन राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव बनाए रखने का जरिया माना जा रहा है। एनसीपी में विभाजन के बाद उन्हें अपनी राजनीतिक वैधता साबित करनी थी, और सत्ता में भागीदारी ने उन्हें प्रशासनिक मंच प्रदान किया। उनके समर्थकों का तर्क है कि वे विकास और शासन को प्राथमिकता देने वाले नेता हैं, न कि केवल विपक्ष की राजनीति करने वाले।
महाराष्ट्र की राजनीति में यह गठबंधन ऐसे समय में आकार ले रहा है, जब राज्य में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की आहट तेज हो रही है। भाजपा नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर स्थिरता और गठबंधन विस्तार पर जोर दे रहा है, जबकि राज्य इकाई स्थानीय समीकरणों और जनभावनाओं को संतुलित करने की चुनौती का सामना कर रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, अजित पवार–भाजपा संबंधों की मजबूती इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की राजनीतिक सीमाओं और अपेक्षाओं को कितनी अच्छी तरह समझ पाते हैं। यदि सत्ता साझेदारी केवल रणनीतिक बनी रहती है और आपसी भरोसा नहीं बढ़ता, तो यह असहजता भविष्य में और स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल, यह गठबंधन सत्ता के केंद्र में है, लेकिन इसके भीतर चल रही खामोश बेचैनी इस बात का संकेत देती है कि महाराष्ट्र की राजनीति में स्थिरता केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि राजनीतिक सामंजस्य से तय होगी। अजित पवार और भाजपा का यह संबंध शक्ति, व्यावहारिकता और असहजता—तीनों का एक साथ प्रतिबिंब बना हुआ है।
