जांजगीर-चांपा — छत्तीसगढ़ को झकझोर कर रख देने वाली एक हृदयविदारक घटना में, जांजगीर-चांपा जिले के एक दंपत्ति ने 16 फरवरी को आत्महत्या कर ली। वे अपने इकलौते बेटे की दुखद मृत्यु के सदमे को सहन करने में असमर्थ थे। कृष्ण पटेल और उनकी पत्नी रंबाई पटेल (47) की इस दोहरी आत्महत्या ने अनसुलझे शोक के विनाशकारी प्रभाव और ग्रामीण समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की गंभीर आवश्यकता को रेखांकित किया है।
दंपत्ति जांजगीर-चांपा पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आने वाले एक गाँव में अपने निवास के आँगन में एक पेड़ से लटके पाए गए। जांचकर्ताओं के अनुसार, दोनों ने अपने जीवन को समाप्त करने के लिए एक ही साड़ी का फंदा बनाया था। इस चरम कदम को उठाने से पहले, उन्होंने एक अंतिम वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया और चार पन्नों का विस्तृत सुसाइड नोट लिखा, जिन्हें अधिकारियों ने बरामद कर लिया है।
घटना और उसका खुलासा
यह त्रासदी तब सामने आई जब पड़ोसियों को संदेह हुआ क्योंकि पटेल के घर का मुख्य द्वार सुबह देर तक अंदर से बंद रहा। बार-बार आवाज देने पर भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो चिंतित ग्रामीणों ने खिड़की से झाँका और आँगन में दंपत्ति को लटका हुआ पाया।
पुलिस को तुरंत सूचित किया गया और उन्होंने मौके पर पहुँचकर शवों को कब्जे में लिया, जिन्हें बाद में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। प्रारंभिक जांच से संकेत मिलता है कि कुछ दिन पहले एक सड़क दुर्घटना में अपने इकलौते बेटे की मृत्यु के बाद से दंपत्ति गहरे अवसाद की स्थिति में थे।
एक अंतिम अनुरोध: वीडियो और नोट
चार पन्नों के सुसाइड नोट में, पटेल दंपत्ति ने अपने बेटे के असामयिक निधन से पैदा हुए असहनीय भावनात्मक शून्य का विवरण दिया। इसके साथ मिले वीडियो में, जिसे साक्ष्य के रूप में जब्त कर लिया गया है, एक मार्मिक अनुरोध किया गया है। दंपत्ति ने आग्रह किया कि उनके बेटे की मृत्यु या उनकी खुद की मृत्यु से मिलने वाला कोई भी बीमा लाभ या वित्तीय मुआवजा कृष्ण पटेल के बड़े भाई को दिया जाए, ताकि विस्तृत परिवार को सहायता मिल सके।
रायपुर की एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अंजली देशपांडे कहती हैं, “यह ‘कॉम्प्लिकेटेड ग्रीफ‘ (जटिल शोक) का एक स्पष्ट मामला है। जब कोई परिवार अपने इकलौते बच्चे को खो देता है, तो अक्सर जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। बिना तत्काल मनोवैज्ञानिक परामर्श या मजबूत सामुदायिक समर्थन प्रणाली के, संयुक्त आत्महत्या के समझौतों का जोखिम काफी बढ़ जाता है।”
गायब सुरक्षा तंत्र
इस घटना ने पूरे गाँव में मातम फैला दिया है, और कई निवासी मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता की कमी पर अफसोस जता रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि अपने बेटे के अंतिम संस्कार के बाद दंपत्ति ने खुद को दुनिया से काट लिया था। हालांकि समुदाय ने पारंपरिक संवेदनाएं व्यक्त की थीं, लेकिन उनकी गहरी मनोवैज्ञानिक पीड़ा अनसुनी रह गई।
एक पड़ोसी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “वे अच्छे लोग थे, लेकिन दुर्घटना के बाद उन्होंने सबसे बात करना बंद कर दिया था। हमें लगा कि उन्हें बस समय चाहिए, लेकिन हमें यह एहसास नहीं हुआ कि वे हमें छोड़कर जाने की योजना बना रहे हैं। अगर उनके दर्द के बारे में बात करने वाला कोई होता, तो शायद वे आज यहाँ होते।”
ग्रामीण मानसिक स्वास्थ्य का संकट
भारत में पारिवारिक त्रासदियों और आर्थिक संकट से जुड़ी आत्महत्याओं में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में उच्च आँकड़े दर्ज किए गए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, राज्य में आत्महत्या के प्रमुख कारणों में “पारिवारिक समस्याएँ” और “बीमारी” बनी हुई हैं। हालांकि, जांजगीर-चांपा जैसे जिलों में सुलभ मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का मतलब है कि कई शोक संतप्त परिवारों को बिना किसी पेशेवर मदद के इस सदमे से गुजरना पड़ता है।
जिला अधिकारियों ने पुष्टि की है कि मामला दर्ज कर लिया गया है और सभी पहलुओं की जांच की जा रही है, जिसमें किसी भी संभावित बाहरी दबाव की संभावना भी शामिल है। फिलहाल, बेटे की “असामयिक मृत्यु” को ही इस घटना का मुख्य कारण माना जा रहा है।
