मुजफ्फरपुर — बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से माता-पिता की क्रूरता की एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ एक महिला का अपनी नाबालिग बेटी के साथ मारपीट करने और “सजा” के तौर पर उसके स्कूल बैग में ईंटें भरकर उसे ढोने के लिए मजबूर करने का वीडियो सामने आया है। 15 फरवरी, 2026 को सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो ने देशव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया है, जिससे बाल अधिकारों और शारीरिक दंड के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर बहस फिर से छिड़ गई है।
घटना: क्रूरता का सार्वजनिक प्रदर्शन
वायरल फुटेज, जो कथित तौर पर एक राहगीर द्वारा बनाया गया था, मुजफ्फरपुर की एक व्यस्त सड़क पर एक अधेड़ उम्र की महिला को बेहद गुस्से में दिखाता है। वीडियो में वह स्कूल यूनिफॉर्म पहनी छोटी बच्ची को बार-बार थप्पड़ मारती दिख रही है। इसके बाद, महिला ने कथित तौर पर बच्ची के स्कूल बैग में कई भारी ईंटें भर दीं।
जैसे ही बच्ची दर्द से रोते और चिल्लाते हुए बैग के वजन के नीचे झुक गई, महिला ने उसे डांटना जारी रखा और उसकी पीड़ा को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। कई मिनटों तक चले इस दृश्य ने स्थानीय निवासियों और राहगीरों की भीड़ इकट्ठा कर दी।
हस्तक्षेप के बावजूद हठधर्मिता
वीडियो में महिला और बीच-बचाव करने की कोशिश करने वाले राहगीरों के बीच तीखी बहस भी कैद हुई है। एक व्यक्ति को चिल्लाते हुए सुना जा सकता है, “112 में फोन कीजिए”, जो भारत की आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ERSS) का संदर्भ दे रहा था।
पुलिस के डर के बजाय, महिला ने कड़ा विरोध दिखाया। उसने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “जिसको फोन करना है कीजिए”, और बच्ची को घसीटकर ले जाने लगी। जब एक अन्य राहगीर ने टिप्पणी की, “बच्चे को ज़बरदस्ती टॉर्चर कर रही है”, तो महिला ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया और अंततः बच्ची को ईंटों से लदा बैग ले जाने के लिए मजबूर करते हुए वहां से चली गई।
पुलिस कार्रवाई और जांच
वीडियो को लाखों बार देखे जाने और तत्काल गिरफ्तारी की मांग उठने के बाद, मुजफ्फरपुर पुलिस ने मामले का औपचारिक संज्ञान लिया है। मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) कांतेश कुमार मिश्रा ने घटना की उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं।
एसएसपी मिश्रा ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा, “मामले को बहुत गंभीरता से लिया गया है। हम वर्तमान में वीडियो के सटीक स्थान और इसमें शामिल व्यक्तियों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं। एक बाल कल्याण अधिकारी (CWO) को इस मामले में लगाया गया है। यदि जांच में बाल शोषण की पुष्टि होती है, तो किशोर न्याय (जेजे) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”
अधिकारी महिला के रास्ते का पता लगाने के लिए मुजफ्फरपुर के विभिन्न चौराहों के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय: हिंसा का चक्र
बाल मनोवैज्ञानिकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस सजा की प्रकृति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। बाल मनोचिकित्सक डॉ. अंजली पाठक ने कहा कि इस तरह के सार्वजनिक अपमान और शारीरिक प्रताड़ना से दीर्घकालिक मानसिक आघात (ट्रॉमा) लग सकता है।
“सजा के तौर पर बच्चे को ईंटें ढोने के लिए मजबूर करना केवल शारीरिक शोषण नहीं है; यह बच्चे के मनोबल को तोड़ने का एक सोचा-समझा प्रयास है। ऐसा आघात अक्सर बाद के वर्षों में पुरानी चिंता, अवसाद या आक्रामक व्यवहार के रूप में प्रकट होता है। राज्य को न केवल अपराधी पर मुकदमा चलाना चाहिए बल्कि पीड़ित को तत्काल परामर्श भी प्रदान करना चाहिए।” — डॉ. अंजली पाठक, बाल मनोचिकित्सक।
भारत में शारीरिक दंड
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के तहत स्कूलों में शारीरिक दंड पर प्रतिबंध के बावजूद, घरेलू स्तर पर शारीरिक दंड भारतीय कानून में एक जटिल क्षेत्र बना हुआ है। कई माता-पिता अभी भी शारीरिक अनुशासन को परवरिश का एक वैध साधन मानते हैं, जो अक्सर आपराधिक शोषण की सीमा पार कर जाता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में बच्चों का एक बड़ा प्रतिशत घर पर किसी न किसी रूप में शारीरिक या भावनात्मक हिंसा का अनुभव करता है। विशेष रूप से बिहार में, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के बारे में जागरूकता अभी भी कम है।
