बरेली — उत्तर प्रदेश के बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने 26 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों और शंकराचार्य से जुड़े विवाद के खिलाफ अपने सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया। यह कदम गणतंत्र दिवस के दिन सामने आया और प्रशासनिक तथा राजनीतिक चर्चाओं में तेजी ला दी है। अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में कहा कि वे ऐसी नीतियों के खिलाफ अपनी मजबूर प्रतिक्रिया दर्ज कराना चाहते हैं जिनसे समाज में विभाजन और संवैधानिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफे के कारणों के रूप में UGC के नए “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस” नियमों पर अपनी असहमति जताई। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों को इक्विटी कमेटी, हेल्पलाइंस और मॉनिटरिंग टीमें स्थापित करने का प्रस्ताव है ताकि जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों को निस्तारित किया जा सके, खासकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए। लेकिन नियमों के लागू होने के बाद कुछ वर्गों ने इसे प्रत्यावर्ती भेदभाव के रूप में देखा है, जिससे विवाद बढ़ा है।
अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में इन नियमों को “काला कानून” बताया और कहा कि इन प्रावधानों से शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होगा तथा यह सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए मनमानी शिकायत और उत्पीड़न की संभावनाएँ बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि यह नियम सामाजिक असंतोष और तनाव की स्थिति पैदा कर सकते हैं और तत्काल वापस लिए जाने चाहिए।
उन्होंने इस्तीफे में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार और प्रशासन की भूमिका पर भी आपत्ति जताई। अग्निहोत्री का दावा था कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के इस तरह के प्रकरण समाज में तनाव और विभाजन को जन्म दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब सरकारें ऐसी नीतियाँ अपनाती हैं जो समाज को विभाजित करती हैं, तो उन्हें जागृत करना आवश्यक हो जाता है।
इस विवाद ने सरकारी और सामाजिक क्षेत्रों में प्रतिक्रियाएँ जन्म दी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने अग्निहोत्री को उनके इस्तीफे के बाद अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया है और उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश जारी किए हैं। उन्हें तत्काल प्रभाव से अलग कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया है, और उन्हें निलंबित स्थिति में रखा गया है। जांच अधिकारी के तौर पर बरेली मंडलायुक्त को नियुक्त किया गया है, और आगे की जांच के लिए चार्जशीट तैयार की जाएगी।
राजनीतिक दलों और समुदाय के नेताओं ने भी विवाद पर अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं। कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष ने बरेली सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे को संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर चेतावनी बताया है और कहा है कि शासन स्वतंत्रता के आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए। वहीं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह मुद्दा जाति या धर्म का नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन और अधिकारियों की गरिमा का है।
कुछ ब्राह्मण संगठनों और समुदाय के लोगों ने भी मामले पर चिंता जताई है। उन्होंने इक्विटी नियमों के कुछ पहलुओं में संशोधन की मांग की है, जबकि अन्य ने अग्निहोत्री के इस्तीफे का समर्थन किया है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि नियमों में यदि ऐसे प्रावधान हैं जो सामान्य वर्ग के छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, तो उन पर पुनर्विचार होना चाहिए।
UGC के नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। इसके तहत शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना, निगरानी प्रणाली स्थापित करना और छात्र समुदाय के भीतर असमानता की शिकायतों के शीघ्र समाधान के प्रावधान शामिल हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि नियमों के क्रियान्वयन में कुछ तकनीकी और संरचनात्मक कमियाँ हैं, जिन पर सुधार की आवश्यकता है।
शिक्षा नीति और सामाजिक संतुलन के बीच संतुलन बनाने के लिए विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार को समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय की संवेदनाएँ और अधिकार सुरक्षित रहे। एक शिक्षा नीति विशेषज्ञ ने कहा, “नियमों को लागू करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे सभी छात्रों के हितों और संवैधानाओं का सम्मान करें और सामाजिक विभाजन की आशंका को कम करें।”
बरेली सिटी मजिस्ट्रेट का यह इस्तीफा न सिर्फ सरकारी नीति और शिक्षा क्षेत्र में विरोध को उजागर करता है, बल्कि सामाजिक समरसता, संवैधानिक मूल्य और नीति निर्माता के फैसलों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौतियों को भी सामने लाता है।
