तमिलनाडु की राजनीति और न्यायपालिका के बीच तनाव एक बार फिर उभर आया है, जब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जी.आर. स्वामिनाथन को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की संभावना व्यक्त की है। यह विवाद मदुरै के एक प्राचीन मंदिर में दीप प्रज्वलन को लेकर दिए गए उनके हालिया आदेश के बाद तेज हो गया है, जिसे राज्य सरकार और कई सामाजिक संगठनों ने परंपरा के विरुद्ध और संवैधानिक सीमाओं से बाहर बताया है।
जस्टिस स्वामिनाथन ने अपने आदेश में कहा था कि मंदिर के पारंपरिक दीप को मुख्य पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित एक पत्थर स्तंभ पर जलाया जाना चाहिए। हालांकि मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार का कहना है कि दशकों से यह दीप नीचे स्थित पारंपरिक स्थान पर ही जलाया जाता रहा है, जो सुरक्षित और नियंत्रित क्षेत्र माना जाता है। न्यायालय के निर्देश और मंदिर प्रशासन की स्थिति में टकराव के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रंग लेने लगा।
DMK के कई सांसदों और सहयोगी दलों का मानना है कि न्यायालय द्वारा धार्मिक प्रथाओं और लोक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। दल के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि “धार्मिक प्रथाओं पर निर्णय स्थानीय परंपराओं और विशेषज्ञों के हाथ में होने चाहिए। अदालत का योगदान कानून और अधिकारों के संरक्षण तक सीमित रहना चाहिए।”
इस विवाद ने कानूनी विशेषज्ञों के बीच भी चर्चा छेड़ दी है। कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यदि कोई जज आम लोगों की भावनाओं और परंपराओं पर बिना पूरी पड़ताल के आदेश देते हैं, तो इससे न्यायपालिका की तटस्थता पर प्रश्न उठते हैं। वहीं, कई अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि “जज किसी प्रशासनिक निर्णय को सही या गलत ठहरा सकते हैं, लेकिन किसी को हटाने जैसी प्रक्रिया अत्यंत गंभीर और दुर्लभ है, जिसे केवल असहमति या विवादित आदेश के आधार पर नहीं चलाया जा सकता।”
लोकसभा में जज को हटाने की प्रक्रिया तभी शुरू हो सकती है जब कम से कम 100 सांसद इस पर हस्ताक्षर करें। उसके बाद संसद इस प्रस्ताव को संबंधित समिति को भेजती है, जो जांच कर अपनी रिपोर्ट देती है। देश में अब तक बहुत कम जजों पर ऐसी प्रक्रिया शुरू की गई है, और यह हमेशा एक संवेदनशील प्रक्रिया मानी जाती है।
जस्टिस जी.आर. स्वामिनाथन कोई अपरिचित नाम नहीं हैं। वे पिछले कुछ वर्षों से कई ऐसे मामलों की सुनवाई कर चुके हैं, जिन्हें तमिलनाडु की सांस्कृतिक और धार्मिक बहसों के केंद्र में माना जाता है। उनके विरोधियों का कहना है कि वे कुछ फैसलों में अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं, जबकि उनके समर्थक दावा करते हैं कि वे कानून और तथ्यों के आधार पर ही निर्णय देते हैं।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस संदर्भ में कहा,
“न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव है। किसी जज के खिलाफ कार्रवाई तब ही उचित है जब इसके लिए ठोस और असंदिग्ध आधार हों।”
इसके बावजूद, सामाजिक संगठनों का एक वर्ग मानता है कि मंदिर मामलों और सांस्कृतिक विषयों पर जल्दबाज़ी में दिए गए न्यायालय के आदेश लोगों के बीच भ्रम और तनाव पैदा कर सकते हैं। मदुरै क्षेत्र के कई स्थानीय संगठनों ने भी इस आदेश का विरोध किया है और इसे परंपरा के विरुद्ध बताया है।
DMK के इस कदम के बाद यह विवाद और गहरा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला केवल एक धार्मिक प्रथा का विवाद नहीं है, बल्कि इसमें न्यायालय की सीमाएं, धार्मिक परंपराएं, राज्य सरकार की भूमिका और राजनीतिक दबाव — सभी शामिल हैं।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या DMK वास्तव में संसद में प्रस्ताव पेश करती है, और यदि हां, तो यह अत्यंत जटिल प्रक्रिया किस दिशा में जाती है। फिलहाल जस्टिस स्वामिनाथन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन यह निश्चित है कि यह मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति और न्यायपालिका के रिश्तों पर लंबी छाप छोड़ सकता है।
