नई दिल्ली — कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक अनवर ने बिहार विधानसभा चुनाव में घटे दल के प्रदर्शन के बाद गंभीर बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों के बीच “कोऑर्डिनेशन की बेहद कमी” रही, और चुनाव रणनीति को तत्काल पुनर्मूल्यांकन की ज़रूरत है।
अनवर ने साफ कहा है कि पार्टी की हाइ-लेवल टीम और राज्य नेतृत्व (state in charge) को हार की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। उनके मुताबिक, “हमारी लोकल टीमों में समन्वय नहीं था — हमारे स्टेट प्रभारी कृष्णा अल्लावरु, हमारी ज़िम्मेदारी देखने वाले लोग जैसे क्लिप नेता शकील अहमद खान और राज्य अध्यक्ष राजेश कुमार चुनावों के दौरान समन्वय तंत्र को सही से स्थापित नहीं कर पाए।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर जमीनी स्तर पर हमारी रणनीति और गठबंधन की योजना स्पष्ट और मजबूत होती, तो परिणाम भिन्न हो सकते थे।”
अनवर ने यह भी चेतावनी दी है कि कांग्रेस को अपनी हार से सबक लेना होगा और पार्टी नेतृत्व को भविष्य के चुनावों में दिक्कतों को दूर करने के लिए “समूह समीक्षा” करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अब हमें सिर्फ हार स्वीकारने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीति, तालमेल और चुनावी तैयारी के हर पहलू पर पुनर्विचार करना होगा।”
पृष्ठभूमि: क्यों है यह बयान मायने रखता है
बिहार में कांग्रेस पिछले कुछ चुनावों में संघर्ष कर रही है और गठबंधन की कमजोर गुटबाजी बार-बार सामने आई है। हाल के वर्षों में, कांग्रेस को कई राज्यों – जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली – में हार का सामना करना पड़ा। अनवर का मानना है कि इन हारों से सीख लेकर ही उनका दल बिहार में फिर से मजबूत दस्तक दे सकता था।
चुनाव से पहले ही अनवर ने चेतावनी दी थी कि समय रहते गठबंधन और रणनीति को स्पष्ट करना होगा। उन्होंने पार्टी हाईकमान से कहा था कि सहयोगियों (जैसे आरजेडी और अन्य लेफ्ट पार्टियों) के साथ सीट-बंटवारे और चुनावी समन्वय के लिए एक समन्वय समिति तुरंत गठित हो।
चुनाव नतीजों के बाद, उन्होंने कहा है कि यह समीक्षा “हर स्तर” पर होगी और पार्टी को इसकी ज़रूरत है, न कि केवल राजनैतिक बयानबाज़ी।
रणनीतिक पुनर्गठन की मांग बढ़ी
अनवर के आह्वान के बाद, कांग्रेस के अंदर समीक्षा की मांग में तेजी आई है। कई पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय नेता भी पूछ रहे हैं कि अगर नेतृत्व और राज्य-प्रभारियों में बेहतर तालमेल होता, तो परिणाम बेहतर क्यों नहीं आए।
विश्लेषकों का कहना है कि अनवर का यह बयान कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। यह सिर्फ चुनावी हार पर प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित अंदरूनी पुनर्गठन का संकेत है।
कुछ वरिष्ठ रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस अब तीन मोर्चों पर सक्रिय होगी: पहली, पार्टी संगठन में सुधार; दूसरी, गठबंधन दलों के साथ बेहतर तालमेल; तीसरी, चुनावी मैसेजिंग और जमीन पर कमजोर-बुने जाल को मज़बूत करना।
आगे क्या हो सकता है: चुनौतियाँ और मौके
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अनवर की समीक्षा मांग से पार्टी के भीतर सक्रिय चर्चा बढ़ सकती है।
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अगर कांग्रेस समीक्षा की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखे और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को शामिल करे, तो इससे विश्वास बहाल हो सकता है।
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लेकिन अगर समीक्षा सिर्फ मौखिक बनी रहे या सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित हो, तो अंदरूनी असंतोष और भी तीव्र हो सकता है।
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गठबंधन सहयोगियों के साथ बेहतर समन्वय की दिशा में कदम उठाना भी चुनौती रहेगा, क्योंकि सीट-बंटवारा और साझा रणनीति में अक्सर मतभेद होते रहे हैं।
तारिक अनवर का यह बयान कांग्रेस के लिए सुनहरे अवसर और बड़े खतरे दोनों को दर्शाता है। उनकी मांग — “रणनीति का पुनर्मूल्यांकन और गठबंधन को सशक्त करना” — अगर गंभीरता से लागू किया गया, तो यह पार्टी को भविष्य में मजबूत पुनरुत्थान की राह दिखा सकता है। लेकिन इसके लिए केवल समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी; कार्रवाई, समन्वय, और जमीन से जुड़ाव भी उतने ही ज़रूरी होंगे।
