भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, एक बड़े आंतरिक विद्रोह का सामना कर रही है। पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने विदेश नीति और ईरान युद्ध के मुद्दे पर राहुल गांधी के रुख से सार्वजनिक रूप से किनारा कर लिया है। अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध और देश में एलपीजी (LPG) आपूर्ति की स्थिति पर वरिष्ठ नेताओं और पार्टी आलाकमान के बीच यह मतभेद अब खुलकर सामने आ गया है।
इस सप्ताह वरिष्ठ नेताओं—कमलनाथ, आनंद शर्मा, शशि थरूर और मनीष तिवारी—ने पश्चिम एशिया संकट पर नरेंद्र मोदी सरकार के “परिपक्व” (Mature) कूटनीतिक रुख की सराहना की है। यह रुख लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बिल्कुल विपरीत है, जिन्होंने भारत की विदेश नीति को “समझौतावादी” और पश्चिमी हितों के प्रति “दब्बू” करार दिया है।
ईरान संकट: ‘समझौता’ बनाम ‘जिम्मेदार कूटनीति’
विवाद की जड़ ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या और फारस की खाड़ी में बढ़ते सैन्य तनाव पर भारत की प्रतिक्रिया में निहित है। राहुल गांधी केंद्र सरकार से इस हत्या की आधिकारिक निंदा करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत की चुप्पी ईरान के साथ हमारे सभ्यतागत संबंधों और रणनीतिक स्वायत्तता के खिलाफ है।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उप-महासचिव और कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद डॉ. शशि थरूर ने सरकार के रुख को “जिम्मेदार कूटनीति” (Responsible Statecraft) बताया है। थरूर का मानना है कि अस्थिर भू-राजनीतिक माहौल में बयानबाजी के बजाय कूटनीतिक सूक्ष्मता अधिक प्रभावी होती है।
इसी तरह, पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर सरकार की प्रशंसा की। उन्होंने लिखा, “संकट का भारतीय कूटनीतिक समाधान परिपक्व और कुशल रहा है, जिससे संभावित खतरों से बचा जा सका है।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि भारत की प्रतिक्रिया “राष्ट्रीय सर्वसम्मति और संकल्प” पर आधारित होनी चाहिए।
एलपीजी संकट: पार्टी के भीतर ही विरोधाभास
आंतरिक कलह केवल विदेशी मामलों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ हफ्तों से, कांग्रेस आलाकमान एलपीजी की कथित कमी को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, इसे होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने से जोड़ रहा है।
लेकिन, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी ही पार्टी के अभियान पर पानी फेर दिया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, “ऐसी कोई कमी नहीं है। यह सिर्फ एक माहौल बनाया जा रहा है कि कमी है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके राज्य में रसोई गैस की कोई किल्लत नहीं है।
भाजपा ने तुरंत इस बयान को हथियार बना लिया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ‘X’ पर लिखा: “अब कांग्रेस नेता कमलनाथ ने खुद स्वीकार कर लिया है कि देश में कोई कमी नहीं है… यह समय कांग्रेस के लिए लोगों के बीच डर और अविश्वास पैदा करना बंद करने का है।”
‘ऑपरेशन सिंदूर’ की छाया
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस इन मुद्दों पर विभाजित हुई है। मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान पर भारत की सैन्य कार्रवाई) के दौरान भी ऐसी ही स्थिति बनी थी।
उस समय भी राहुल गांधी ने सरकार की “राजनीतिक इच्छाशक्ति” पर सवाल उठाए थे, जबकि थरूर और तिवारी को सरकार ने भारत का पक्ष रखने के लिए विदेश जाने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया था। अपनी ही पार्टी की लाइन से अलग जाकर सेना और सरकार की तारीफ करने के कारण, कांग्रेस नेतृत्व ने इन दोनों नेताओं को संसद में इस विषय पर बोलने का मौका नहीं दिया था।
राष्ट्रीय हित बनाम पार्टी राजनीति
सरकार इस संकट के दौरान एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु के बाद, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए, जिसे औपचारिक निंदा किए बिना संबंधों की मौन स्वीकृति के रूप में देखा गया।
आनंद शर्मा ने उल्लेख किया, “राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय हित द्वारा निर्देशित परिपक्व प्रतिक्रिया समय की मांग है।” उन्होंने रेखांकित किया कि सभ्यतागत संबंधों के अलावा, ऊर्जा संकट “राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न” है जो पार्टी की राजनीति से ऊपर है।
जैसे-जैसे ईरान में संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर रहा है, कांग्रेस खुद को एक कठिन स्थिति में पा रही है। वरिष्ठ नेताओं का राहुल गांधी की “सत्ता-विरोधी” विदेश नीति को समर्थन देने से इनकार करना यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामलों में पार्टी के भीतर गंभीर वैचारिक मतभेद हैं।
