नई दिल्ली — दिल्ली हाईकोर्ट ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले एक नई राजनीतिक पार्टी के पंजीकरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हस्तक्षेप किया है। जस्टिस अमित बंसल ने 17 मार्च को दिए अपने आदेश में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि वह राजनीतिक दलों के पंजीकरण के लिए अनिवार्य ’30-दिन की आपत्ति अवधि’ में ढील देने की याचिका पर “तेजी से” विचार करे।
मामला: चुनाव कार्यक्रम और समय की कमी
यह कानूनी चुनौती ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ द्वारा दायर की गई थी। पार्टी ने अदालत से गुहार लगाई थी कि सार्वजनिक सूचना की 30 दिन की अवधि को घटाकर 7 दिन कर दिया जाए। वर्तमान नियमों के अनुसार, किसी भी नए दल को पंजीकरण से पहले 30 दिनों तक सार्वजनिक आपत्तियों का इंतजार करना पड़ता है, जिसके बाद ही उसे चुनाव चिह्न आवंटित किया जा सकता है।
चूंकि चुनाव आयोग ने 15 मार्च 2026 को बंगाल चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है और पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया 30 मार्च से शुरू होनी है, पार्टी ने तर्क दिया कि 30 दिन का नियम उन्हें चुनाव लड़ने से रोक देगा। यह पार्टी कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक निष्कासित नेता द्वारा बनाई गई है और राज्य के राजनीतिक समीकरणों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
अदालत का फैसला और मिसाल
जस्टिस बंसल ने अपने आदेश में ‘राम अधीन दास बनाम चुनाव आयोग’ मामले में दिए गए पिछले फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि यदि चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है, तो चुनाव आयोग के पास प्रशासनिक समयसीमा को कम करने का अधिकार है ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित न हो।
अदालत ने ईसीआई को निर्देश दिया कि:
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पार्टी द्वारा 13 मार्च को दिए गए आवेदन पर बिना किसी देरी के विचार किया जाए।
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यदि निर्धारित (घटाई गई) अवधि में कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती है, तो आयोग तुरंत पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करे और कानून के अनुसार चुनाव चिह्न आवंटित करे।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 का कार्यक्रम
यह कानूनी घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब बंगाल में दो चरणों में मतदान की तैयारी चल रही है:
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पहला चरण: 23 अप्रैल 2026 (152 सीटें)
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दूसरा चरण: 29 अप्रैल 2026 (142 सीटें)
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नतीजे: 4 मई 2026
‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ का यह प्रयास दर्शाता है कि इस बार के चुनावों में छोटे दल और नए राजनीतिक मोर्चे भी सक्रिय भूमिका निभाने की तैयारी में हैं। एक साझा चुनाव चिह्न प्राप्त करना किसी भी नए दल के लिए मतदाताओं के बीच पहचान बनाने हेतु अनिवार्य होता है, और हाईकोर्ट का यह आदेश उस दिशा में एक बड़ी राहत साबित हो सकता है।
