कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—SIR) को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच एक वरिष्ठ नौकरशाह का नाम चर्चा के केंद्र में आ गया है। सी मुरुगन, जो भारत निर्वाचन आयोग के विशेष रोल पर्यवेक्षक के रूप में तैनात हैं, इस समय सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीखे आरोपों का सामना कर रहे हैं।
सी मुरुगन 2007 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और पश्चिम बंगाल कैडर से ताल्लुक रखते हैं। प्रशासनिक हलकों में उन्हें एक सख्त और प्रक्रिया-आधारित अधिकारी के रूप में जाना जाता है। मौजूदा विवाद तब तेज हुआ जब टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने उन पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की “खुलेआम अवहेलना” करने का आरोप लगाया।
टीएमसी का दावा है कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। पार्टी नेताओं का कहना है कि मुरुगन की भूमिका केवल पर्यवेक्षण तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने जमीनी स्तर पर ऐसे निर्णयों को बढ़ावा दिया, जिनसे वैध मतदाताओं के नाम कटने का खतरा पैदा हुआ।
हालांकि, प्रशासनिक सूत्रों और निर्वाचन आयोग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि विशेष रोल पर्यवेक्षक की भूमिका निगरानी और रिपोर्टिंग तक सीमित होती है, न कि प्रत्यक्ष रूप से नाम जोड़ने या हटाने की। एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी ने कहा, “पर्यवेक्षक का काम यह सुनिश्चित करना है कि प्रक्रिया नियमों के अनुसार हो। अंतिम निर्णय स्थानीय स्तर पर तय प्रक्रियाओं के तहत ही लिए जाते हैं।”
यह पहला मौका नहीं है जब सी मुरुगन और टीएमसी नेतृत्व आमने-सामने आए हों। इससे पहले भी विभिन्न प्रशासनिक मुद्दों पर उनकी सत्तारूढ़ दल के नेताओं से टकराहट की खबरें सामने आती रही हैं। इन घटनाओं ने मुरुगन को एक ऐसे अधिकारी की छवि दी है, जो राजनीतिक दबाव के बजाय संस्थागत प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देते हैं।
एसआईआर की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो यह प्रक्रिया भारत निर्वाचन आयोग द्वारा समय-समय पर इसलिए कराई जाती है, ताकि मतदाता सूची को शुद्ध रखा जा सके। इसका उद्देश्य मृत मतदाताओं, दोहरे नामों और फर्जी प्रविष्टियों को हटाना होता है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस तरह की प्रक्रिया शुरू होने पर अक्सर राजनीतिक विवाद खड़े हो जाते हैं, खासकर तब जब बड़ी संख्या में नाम हटने की आशंका जताई जाती है।
टीएमसी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान जिन क्षेत्रों में पार्टी का जनाधार मजबूत है, वहाँ अधिक संख्या में नामों की समीक्षा की गई। पार्टी नेताओं का कहना है कि इससे चुनावी संतुलन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, आयोग का रुख रहा है कि प्रक्रिया पूरे राज्य में समान रूप से लागू की गई है और इसमें किसी प्रकार का राजनीतिक पक्षपात नहीं है।
एक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा, “जब चुनावी प्रक्रिया में न्यायालय, निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार—तीनों की भूमिका एक साथ आती है, तो टकराव की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में अधिकारियों पर आरोप लगना असामान्य नहीं है, लेकिन अंतिम कसौटी यह होती है कि क्या प्रक्रिया कानूनी ढांचे के भीतर रही।”
सी मुरुगन को लेकर उठे सवाल अब केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित नहीं हैं। यह मामला व्यापक रूप से चुनावी पारदर्शिता, प्रशासनिक स्वायत्तता और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ गया है। जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन और आगामी चुनावों की समय-सीमा नज़दीक आ रही है, यह विवाद और गहराने की संभावना है।
फिलहाल, मुरुगन की भूमिका और एसआईआर की प्रक्रिया दोनों ही न्यायिक और राजनीतिक जांच के दायरे में हैं। आने वाले दिनों में अदालत और निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रियाएँ इस विवाद की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगी।
