भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार के 28 जनवरी के आदेश, जिसमें सभी आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाए जाने का निर्देश दिया गया है, ने एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा को चुनौती दी है। आज़ादी से पहले 1937 से कांग्रेस नेतृत्व यह रुख अपनाता रहा है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल इसके पहले दो अंतरे ही गाए जाएं। इस नए निर्देश के बाद गीत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत पर बहस फिर केंद्र में आ गई है।
वंदे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी और यह 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना। ब्रिटिश शासन के दौरान यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया और देशभर में राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने लगा। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर 1947 की आज़ादी तक, वंदे मातरम् जनआंदोलनों और राजनीतिक सभाओं में गूंजता रहा। हालांकि, इसकी लोकप्रियता के साथ-साथ कुछ हिस्सों को लेकर विवाद भी उभरते गए।
आजादी से पहले ही यह सवाल उठने लगा था कि गीत के सभी अंतरे समान रूप से स्वीकार्य हैं या नहीं। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह स्पष्ट किया था कि वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे—जो मातृभूमि की प्राकृतिक और सांस्कृतिक प्रशंसा तक सीमित हैं—ही सार्वजनिक रूप से गाए जाएं। इसके पीछे तर्क यह था कि आगे के अंतरों में देवी-पूजा से जुड़े प्रतीकात्मक संदर्भ हैं, जिन्हें लेकर कुछ समुदायों में असहजता हो सकती है। इसी संतुलन के आधार पर आज़ादी के बाद भी दशकों तक सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में केवल दो अंतरे ही प्रचलन में रहे।
हालिया आदेश इस स्थापित समझ से अलग दिशा में जाता दिखाई देता है। सरकार का तर्क है कि वंदे मातरम् एक संपूर्ण रचना है और इसके सभी अंतरे भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। संस्कृति मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “राष्ट्रीय गीत को उसके संपूर्ण स्वरूप में प्रस्तुत करना हमारी साझा विरासत को सम्मान देने का तरीका है।” उनके अनुसार, इस कदम का उद्देश्य किसी समुदाय को अलग-थलग करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रचना को उसकी मूल भावना के साथ प्रस्तुत करना है।
वहीं, आलोचकों का कहना है कि यह निर्णय एक संवेदनशील मुद्दे को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने याद दिलाया है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान व्यापक सहमति से दो अंतरों की परंपरा अपनाई गई थी, ताकि राष्ट्रीय एकता बनी रहे। उनका तर्क है कि प्रतीकों से जुड़े फैसलों में ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक संतुलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इतिहासकारों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के बीच भी इस विषय पर मतभेद हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि वंदे मातरम् को उसके साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए, न कि केवल समकालीन राजनीति के चश्मे से। वहीं, अन्य विशेषज्ञ यह रेखांकित करते हैं कि राष्ट्रीय प्रतीकों की स्वीकृति तभी स्थायी होती है, जब वे विविधताओं से भरे समाज में व्यापक सहमति पैदा करें। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार के अनुसार, “वंदे मातरम् की ताकत उसकी भावनात्मक अपील में है, लेकिन यही अपील अलग-अलग संदर्भों में अलग अर्थ भी ले सकती है।”
150 वर्षों की यात्रा में वंदे मातरम् एक गीत से कहीं आगे बढ़कर पहचान, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक बहस का प्रतीक बन चुका है। कभी यह औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज था, तो आज यह इस सवाल का केंद्र है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को कैसे और किस रूप में प्रस्तुत किया जाए। केंद्र सरकार का नया निर्देश इस बहस को और गहरा कर सकता है, खासकर तब जब देश विविध धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचानों से मिलकर बना हो।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह निर्णय केवल प्रशासनिक आदेश तक सीमित रहता है या समाज और राजनीति में व्यापक चर्चा को जन्म देता है। वंदे मातरम् की विरासत इस बात की याद दिलाती है कि राष्ट्रीय प्रतीक समय के साथ बदलती व्याख्याओं और बहसों से गुजरते रहते हैं, और यही प्रक्रिया उन्हें जीवंत बनाए रखती है।
