उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों “आज़ाद प्रभाव” को लेकर हलचल तेज़ होती जा रही है। नगीना से सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद की रैलियों में उमड़ती भारी भीड़ ने राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हाल के हफ्तों में कन्नौज, आगरा और संत कबीर नगर में हुई उनकी सभाओं में बड़ी संख्या में युवाओं, दलितों और पिछड़े वर्गों की भागीदारी देखी गई है। अब 11 फरवरी को दिल्ली में प्रस्तावित उनकी सार्वजनिक सभा को भी राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़े हालिया विवाद ने चंद्रशेखर आज़ाद को एक बार फिर दलित और छात्र राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। शिक्षा में समान अवसर, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर आज़ाद की मुखरता ने खासकर युवा मतदाताओं के बीच उन्हें नई पहचान दिलाई है।
कन्नौज और आगरा में आयोजित रैलियों में हजारों की संख्या में लोगों की मौजूदगी ने सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों खेमों को सतर्क कर दिया है। संत कबीर नगर की सभा में भी स्थानीय नेताओं और सामाजिक संगठनों की भागीदारी उल्लेखनीय रही। इन रैलियों में आज़ाद ने केंद्र और राज्य सरकार पर शिक्षा नीतियों को लेकर दलित और वंचित समुदायों के साथ अन्याय का आरोप लगाया।
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है,
“चंद्रशेखर आज़ाद की सभाओं में जो ऊर्जा दिख रही है, वह पारंपरिक दलित राजनीति से अलग है। यह युवा असंतोष और सामाजिक न्याय की नई अभिव्यक्ति है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए मुश्किल होगा।”
चंद्रशेखर आज़ाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित अधिकार आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं। सहारनपुर हिंसा के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए आज़ाद ने भीम आर्मी के जरिए सामाजिक न्याय, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से जीत दर्ज कर उन्होंने यह साबित किया कि उनका प्रभाव केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति में भी निर्णायक हो सकता है।
सांसद बनने के बाद आज़ाद ने संसद के भीतर और बाहर दोनों मंचों से सामाजिक असमानता, शिक्षा नीति और आरक्षण जैसे मुद्दों को उठाया है। हालिया यूजीसी विवाद के दौरान उन्होंने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया, जिससे उन्हें दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच समर्थन मिला।
यूजीसी से जुड़े नियमों और नियुक्तियों को लेकर उठे विवाद ने छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को लामबंद किया है। आज़ाद ने इसे केवल प्रशासनिक मुद्दा न बताते हुए सामाजिक न्याय से जोड़ा। एक हालिया सभा में उन्होंने कहा,
“शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बराबरी का अधिकार है। अगर नीतियां वंचित समाज के खिलाफ होंगी, तो हम सड़क से संसद तक संघर्ष करेंगे।”
यह बयान सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से साझा किया गया और इससे उनकी लोकप्रियता में और इज़ाफा हुआ।
भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस—तीनों ही दल आज़ाद की गतिविधियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं। खासकर पश्चिमी और मध्य यूपी में दलित वोट बैंक पर उनके प्रभाव को लेकर आकलन किया जा रहा है। कुछ नेताओं का मानना है कि यदि आज़ाद स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरते हैं, तो यह पारंपरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
एक वरिष्ठ राजनीतिक रणनीतिकार के अनुसार,
“आज़ाद का उभार केवल भीड़ तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या यह ऊर्जा संगठनात्मक ढांचे और चुनावी गठजोड़ में बदल पाएगी।”
11 फरवरी को दिल्ली में होने वाली सभा को आज़ाद की राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती सक्रियता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह सभा न केवल यूपी बल्कि अन्य राज्यों के दलित और छात्र संगठनों को भी जोड़ने का प्रयास मानी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि “आज़ाद प्रभाव” स्थायी राजनीतिक ताकत बनता है या फिलहाल जन आंदोलनों तक सीमित रहता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रशेखर आज़ाद को अब नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
