पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया के दौरान हाल के महीनों में एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण दृश्य देखने को मिला है। राज्य के विभिन्न जिलों में आयोजित SIR सुनवाई केंद्रों पर साधु-संन्यासी, मठों से जुड़े भिक्षु और धार्मिक संस्थाओं के सदस्य भी आम नागरिकों की तरह कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं। दस्तावेजों में पाई गई विसंगतियों के कारण इन्हें निर्वाचन अधिकारियों के सामने अपनी पहचान और मतदाता पात्रता स्पष्ट करनी पड़ रही है।
SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध करना है, ताकि मृत, स्थानांतरित या दोहरे नामांकन वाले मतदाताओं की पहचान कर उन्हें हटाया जा सके और योग्य मतदाताओं को सूची में बनाए रखा जा सके। इस दौरान पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में मतदाताओं को दस्तावेजी “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर सुनवाई के लिए बुलाया गया। इनमें साधु-संन्यासी भी शामिल हैं, जिनकी जीवनशैली और धार्मिक परंपराएं सामान्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं से कई बार अलग होती हैं।
धार्मिक जीवन अपनाने वाले कई साधु और संन्यासी दीक्षा के बाद अपना नाम बदल लेते हैं। कई मामलों में उन्होंने अपने जन्मनाम की जगह दीक्षा के बाद मिला नाम दर्ज कराया होता है, जबकि पिता के नाम के स्थान पर गुरु या किसी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े नाम का उल्लेख किया जाता है। यही अंतर SIR प्रक्रिया में दस्तावेजी असंगति का कारण बन रहा है।
भरत सेवाश्रम संघ से जुड़े एक वरिष्ठ संन्यासी ने बताया,
“हमारा जीवन सांसारिक पहचान से ऊपर होता है, लेकिन मतदान एक संवैधानिक अधिकार है। यदि दस्तावेजों में कोई तकनीकी समस्या है, तो उसे ठीक कराना हमारी जिम्मेदारी भी है।”
उनके अनुसार, अधिकांश मामलों में आवश्यक हलफनामे और पहचान पत्र प्रस्तुत करने के बाद सुनवाई बिना किसी बड़ी परेशानी के पूरी हो जाती है।
इस्कॉन से जुड़े कई भिक्षुओं और अनुयायियों को भी SIR सुनवाई के लिए बुलाया गया। संगठन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि ज्यादातर सदस्यों ने अपने दस्तावेज पहले से व्यवस्थित रखे थे, इसलिए उन्हें अधिक कठिनाई नहीं हुई। हालांकि, दीक्षा के बाद नाम परिवर्तन और अलग-अलग पते होने के कारण कुछ सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी।
इस्कॉन से जुड़े एक प्रवक्ता ने कहा,
“यह प्रक्रिया मतदाता सूची की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। धार्मिक पहचान रखने वाले नागरिक भी कानून और लोकतांत्रिक नियमों के दायरे में आते हैं।”
उनका मानना है कि प्रशासन ने अधिकांश मामलों में सहयोगात्मक रवैया अपनाया है।
SIR प्रक्रिया को लेकर राज्य में व्यापक बहस भी चल रही है। जहां प्रशासन इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की कवायद बता रहा है, वहीं कुछ राजनीतिक दल और सामाजिक समूह इसे अत्यधिक सख्त और समयबद्ध मान रहे हैं। खासतौर पर उन लोगों के लिए परेशानी बढ़ी है, जिनकी जीवनशैली पारंपरिक दस्तावेजी ढांचे में आसानी से फिट नहीं बैठती।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि साधु-संन्यासियों का बड़ी संख्या में सुनवाई केंद्रों पर पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि मताधिकार को लेकर धार्मिक समुदायों में भी जागरूकता है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं जब सांस्कृतिक विविधताओं से टकराती हैं, तो संवेदनशीलता की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
भारत में समय-समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया जाता है, ताकि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे। SIR इसी का एक गहन रूप है, जिसमें घर-घर सत्यापन, दस्तावेजों की जांच और आपत्तियों की सुनवाई शामिल होती है। पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर की जा रही है, जिससे अंतिम मतदाता सूची अधिक सटीक हो सके।
साधु-संन्यासियों की SIR सुनवाई में भागीदारी ने यह दिखाया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया समाज के हर वर्ग तक पहुंच रही है। हालांकि, नाम परिवर्तन, गुरु-शिष्य परंपरा और स्थायी पते जैसी विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि वह लचीलापन और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए।
अंततः, यह प्रक्रिया केवल दस्तावेजों की जांच नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में विश्वास को मजबूत करने का प्रयास भी है—जहां साधु, संन्यासी और सामान्य नागरिक, सभी समान रूप से अपने मताधिकार की रक्षा के लिए कतार में खड़े हैं।
