मणिपुर में नवगठित राज्य सरकार के गठन के बाद एक बार फिर राजनीतिक और जातीय तनाव सामने आया है। क्यूकी-ज़ो परिषद ने उपमुख्यमंत्री नेंचा किपगेन के सरकार में शामिल होने को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि उन्हें अपने निर्णय से उत्पन्न होने वाले सभी परिणामों की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी। परिषद का यह बयान राज्य में चल रही संवेदनशील राजनीतिक परिस्थितियों के बीच आया है।
हाल ही में राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद मणिपुर में नई सरकार का गठन किया गया। मुख्यमंत्री के साथ-साथ दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति को विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन साधने के प्रयास के रूप में देखा गया। नेंचा किपगेन, जो क्यूकी-ज़ो समुदाय से आती हैं, को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को सरकार की समावेशी रणनीति के तौर पर प्रस्तुत किया गया। हालांकि, क्यूकी-ज़ो परिषद का मानना है कि यह कदम समुदाय की सामूहिक राजनीतिक मांगों के विपरीत है।
क्यूकी-ज़ो परिषद लंबे समय से अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग करती रही है। परिषद का कहना है कि जब तक राज्य और केंद्र सरकार इस मांग पर स्पष्ट और लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक समुदाय के प्रतिनिधियों को सरकार में शामिल नहीं होना चाहिए। परिषद के अनुसार, यह फैसला पहले से तय सामूहिक निर्णयों के खिलाफ है, जिन पर समुदाय के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों के बीच सहमति बनी थी।
परिषद ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यदि कोई विधायक इस सामूहिक निर्णय की अनदेखी करता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होगा। परिषद ने यह भी कहा कि ऐसे किसी भी कदम से उत्पन्न होने वाले सामाजिक या राजनीतिक परिणामों की जिम्मेदारी संगठन नहीं लेगा।
नेंचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद कई क्यूकी-ज़ो संगठनों और नागरिक समूहों ने असंतोष व्यक्त किया है। कुछ संगठनों का मानना है कि मौजूदा सरकार में शामिल होना समुदाय की वर्षों पुरानी राजनीतिक मांगों को कमजोर कर सकता है। कई क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन और आह्वान किए गए हैं, जिनमें अलग प्रशासन की मांग को दोहराया गया।
समुदाय के नेताओं का कहना है कि वर्तमान सरकार की संरचना अब भी बहुसंख्यक समुदाय के प्रभाव में है और इससे पहाड़ी इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा।
मणिपुर पिछले कुछ वर्षों से जातीय तनाव और हिंसा से जूझ रहा है। भूमि अधिकार, जनजातीय दर्जा, प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर मतभेद गहराते रहे हैं। इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं और कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।
इन्हीं परिस्थितियों के चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। नई सरकार के गठन से शांति और स्थिरता की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन हालिया विवाद से यह स्पष्ट हो गया है कि राजनीतिक समाधान अभी भी जटिल बना हुआ है।
क्यूकी-ज़ो परिषद के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा कि अलग प्रशासन की मांग एक वैध और लोकतांत्रिक मांग है, और ऐसे में सरकार में शामिल होना समुदाय के रुख के विपरीत है। उनके अनुसार, यह निर्णय न केवल विरोधाभासी है बल्कि इससे समुदाय की सामूहिक राजनीतिक ताकत भी प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से मणिपुर की गहरी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए सभी समुदायों के बीच संवाद, विश्वास निर्माण और ठोस राजनीतिक आश्वासन आवश्यक हैं।
मणिपुर में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति बहाल करना और सभी समुदायों की चिंताओं को समान रूप से संबोधित करना है। नेंचा किपगेन का सरकार में शामिल होना जहां एक ओर समावेशिता का संकेत माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह कदम समुदाय के भीतर नए मतभेद भी पैदा कर रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस विवाद को किस प्रकार संभालती हैं और क्या अलग प्रशासन की मांग पर कोई ठोस राजनीतिक पहल होती है।
