गुवाहाटी — असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की हालिया ‘मिया’ टिप्पणी ने राज्य की राजनीति में तीखा विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्षी दलों ने इसे “अभूतपूर्व रूप से निम्न स्तर” का बयान करार देते हुए मुख्यमंत्री पर “नफरत की राजनीति” करने और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने का आरोप लगाया है। वहीं, मुख्यमंत्री सरमा अपने बयान का बचाव करते हुए इसे अवैध प्रव्रजन से जुड़ी चिंता के संदर्भ में रखा गया कथन बता रहे हैं।
यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) ने संयुक्त रूप से मुख्यमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की भाषा समाज में विभाजन पैदा करती है और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाती है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति से इस तरह के बयान राज्य की सामाजिक सौहार्द की परंपरा के विपरीत हैं।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके बयान को संदर्भ से बाहर निकालकर प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने अवैध आव्रजन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार की प्राथमिकता असम की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा,
“मेरे बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। अवैध घुसपैठ एक गंभीर मुद्दा है और इस पर खुलकर चर्चा करना जरूरी है।”
असम में ‘मिया’ शब्द लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा रहा है। ऐतिहासिक रूप से इस शब्द का प्रयोग बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के लिए किया जाता रहा है, जिसे लेकर कई बार विवाद खड़े हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह शब्द अपमानजनक संदर्भ में प्रयोग होता रहा है, जबकि कुछ लोग इसे पहचान के रूप में देखने की बात करते हैं।
राज्य की राजनीति में यह मुद्दा नया नहीं है। असम आंदोलन के दौर से ही अवैध प्रव्रजन और नागरिकता का प्रश्न चुनावी बहस का केंद्र रहा है। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) जैसे विषयों ने भी राज्य में गहरी राजनीतिक ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा की है। मौजूदा विवाद को इसी व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री के बयान संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। असम कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,
“यह बयान केवल राजनीतिक लाभ के लिए समाज को बांटने का प्रयास है। मुख्यमंत्री को अपनी भाषा और जिम्मेदारी का ध्यान रखना चाहिए।”
AIUDF ने भी चेतावनी दी है कि इस तरह की बयानबाजी से राज्य में सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भाजपा का तर्क है कि विपक्ष इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से तूल दे रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री ने अवैध आव्रजन जैसे संवेदनशील विषय पर अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी है और इसे सांप्रदायिक रंग देना गलत है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद आने वाले समय में और तेज हो सकता है, खासकर तब जब राज्य में चुनावी गतिविधियां धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। एक राजनीतिक विशेषज्ञ का कहना है,
“असम की राजनीति में पहचान और प्रव्रजन से जुड़े मुद्दे हमेशा संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में शब्दों का चयन और सार्वजनिक वक्तव्यों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।”
फिलहाल, यह मुद्दा केवल बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य की राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव का प्रतीक बन गया है। यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री या उनकी सरकार इस विवाद को शांत करने के लिए कोई पहल करती है या यह मुद्दा और व्यापक राजनीतिक बहस का रूप लेता है।
