तमिलनाडु में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की चुनावी परीक्षा आज से औपचारिक रूप से शुरू हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य में प्रचार अभियान की शुरुआत ऐसे समय हो रही है, जब विपक्षी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) सत्ता में मजबूत स्थिति में है और एनडीए राज्य में अपने संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक आधार को फिर से गढ़ने की कोशिश कर रहा है। आज के मंच पर प्रधानमंत्री के साथ दिखाई देने वाले चेहरे केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश हैं—कि एनडीए तमिलनाडु में विविध जातीय समूहों, क्षेत्रीय दलों और छोटे राजनीतिक संगठनों को एक छत के नीचे लाने का प्रयास कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तमिलनाडु एनडीए के लिए लंबे समय से एक चुनौतीपूर्ण राज्य रहा है। द्रविड़ राजनीति के मजबूत प्रभाव और केंद्र बनाम राज्य की बहसों के बीच भाजपा और उसके सहयोगी दलों को यहां सीमित चुनावी सफलता मिली है। हालांकि, हाल के वर्षों में भाजपा ने राज्य में संगठन विस्तार, बूथ स्तर की तैयारी और नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने पर विशेष ध्यान दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं माना जा रहा। मंच पर मौजूद विभिन्न समुदायों और छोटे दलों के प्रतिनिधि यह संकेत देने की कोशिश हैं कि एनडीए का दायरा केवल एक राष्ट्रीय दल तक सीमित नहीं है। भाजपा नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि गठबंधन तमिलनाडु की सामाजिक विविधता को समझते हुए एक व्यापक राजनीतिक विकल्प पेश कर रहा है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “तमिलनाडु में हमारी रणनीति केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक आधार तैयार करने की है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में उत्साह है और सहयोगी दलों को भी भरोसा मिल रहा है।” यह बयान एनडीए की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें राज्य को तुरंत परिणामों के बजाय भविष्य की दृष्टि से देखा जा रहा है।
पृष्ठभूमि में देखें तो तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय पहचान और केंद्र से स्वायत्तता जैसे मुद्दे यहां की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। डीएमके और एआईएडीएमके ने लंबे समय तक सत्ता में बारी-बारी से शासन किया है, जबकि राष्ट्रीय दलों की भूमिका सीमित रही है। ऐसे में एनडीए का यह प्रयास पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
आज के कार्यक्रम में मंच की संरचना भी राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है। विभिन्न जातीय समूहों के प्रतिनिधि, क्षेत्रीय नेताओं और छोटे दलों के चेहरों को साथ लाकर एनडीए यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि उसका गठबंधन केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का भी दावा करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह रणनीति डीएमके के सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति के नैरेटिव को संतुलित करने की कोशिश है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में एक जनसभा में कहा था, “लोकतंत्र की मजबूती तभी आती है जब हर क्षेत्र और हर वर्ग की आवाज़ राष्ट्रीय विकास में शामिल हो।” एनडीए के रणनीतिकारों का कहना है कि यही संदेश तमिलनाडु के मतदाताओं तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं। डीएमके सरकार राज्य में अपनी नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय मुद्दों पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है। एनडीए के लिए यह जरूरी होगा कि वह स्थानीय मुद्दों—रोजगार, भाषा, संघीय ढांचा और विकास—पर स्पष्ट और विश्वसनीय दृष्टिकोण पेश करे। केवल राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के भरोसे राज्य की जटिल राजनीति को साधना आसान नहीं माना जा रहा।
कुल मिलाकर, आज से शुरू हो रहा यह अभियान एनडीए के लिए केवल एक चुनावी दौरा नहीं, बल्कि तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से परिभाषित करने की कोशिश है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि विविध चेहरों और व्यापक गठबंधन का यह प्रयोग डीएमके के खिलाफ कितना असरदार साबित हो पाता है।
