मुंबई — मुंबई की राजनीति के महासंग्राम, 2026 के बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव के नतीजे आने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) एक ऐतिहासिक चौराहे पर खड़ी है। मात्र छह सीटों पर सिमट जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने पार्टी कार्यकर्ताओं को “काम पर वापस लौटने” का आह्वान किया है। उन्होंने इस हार को अंत नहीं, बल्कि “मराठी अस्मिता” के लिए एक नए संघर्ष की शुरुआत बताया है।
16 जनवरी, 2026 को घोषित परिणामों ने मुंबई की सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। 227 वार्डों वाली बीएमसी में भाजपा नीत ‘महायुति’ गठबंधन ने 118 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ ही बीएमसी पर ठाकरे परिवार का तीन दशक पुराना दबदबा खत्म हो गया है। जहाँ भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, वहीं एमएनएस खुद को हाशिए पर खड़ा पा रही है।
राज ठाकरे की प्रतिक्रिया: ‘शिव शक्ति’ बनाम ‘धनशक्ति’
निराशाजनक नतीजों के बावजूद, राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर एक आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने ‘एक्स’ (X) पर लिखा कि पार्टी को “नए सिरे से खड़ा करने” का समय आ गया है। उन्होंने इस हार को विचारधारा की विफलता नहीं, बल्कि सत्ता और धनबल के खिलाफ एक असमान लड़ाई बताया।
ठाकरे ने कहा:
“सबसे पहले, एमएनएस और शिवसेना (यूबीटी) के सभी निर्वाचित पार्षदों को हार्दिक बधाई। यह चुनाव आसान नहीं था। यह ‘शिव शक्ति’ के खिलाफ अपार धनशक्ति और राज्य सत्ता की लड़ाई थी। लेकिन ऐसी लड़ाई में भी दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने बेहतरीन मुकाबला किया। उनकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।”
ठाकरे ने चेतावनी दी कि सत्ता में बैठे लोग “मराठी लोगों को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे।” उन्होंने जोर देकर कहा कि मुंबई और एमएमआर (MMR) क्षेत्र में मराठी मानुस के हितों की रक्षा के लिए एमएनएस का मजबूत होना अनिवार्य है।
ठाकरे भाइयों का फीका प्रदर्शन
2026 के इन चुनावों में “ठाकरे प्रयोग” की विफलता सबसे बड़ी चर्चा का विषय रही। दशकों में पहली बार, चचेरे भाई—उद्धव और राज—मराठी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए एक-दूसरे के प्रति नरम दिखे थे। हालांकि, यह रणनीतिक तालमेल वोटरों को लुभाने में नाकाम रहा।
जहाँ उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) 65 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही, वहीं एमएनएस की मात्र छह सीटें उसकी राजनीतिक साख पर बड़ा सवालिया निशान हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो मतदाता हिंदुत्व चाहते थे, वे भाजपा-शिंदे गुट की ओर चले गए, और जो पारंपरिक शिवसेना की पहचान से जुड़े थे, उन्होंने उद्धव का साथ दिया। एमएनएस इन दोनों के बीच “त्रिशंकु” बनकर रह गई।
डॉ. संहिता जोशी, राजनीति विज्ञान विशेषज्ञ, मुंबई विश्वविद्यालय ने कहा:
“चुनाव परिणाम मुंबई में राजनीतिक विकल्पों के सिमटने का संकेत देते हैं। एमएनएस, जो कभी एक मजबूत तीसरे ध्रुव के रूप में उभरी थी, अब उस परिदृश्य में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है जहाँ भाजपा और शिंदे गुट ने मराठी-हिंदुत्व के नैरेटिव पर कब्जा कर लिया है।”
साख बचाने की चुनौती
एमएनएस की इस गिरावट को समझने के लिए उसके इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। 2006 में शिवसेना से अलग होकर पार्टी बनाने वाले राज ठाकरे ने 2012 के बीएमसी चुनाव में 28 सीटें जीती थीं। तब उन्हें “किंगमेकर” माना जाता था। लेकिन पिछले एक दशक में, पार्टी अपने संदेश में स्पष्टता की कमी—कभी कट्टर मराठी अस्मिता तो कभी हिंदुत्व—के कारण कमजोर होती गई।
आगे की राह: मलबे से पुनर्निर्माण
राज ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बचे हुए कार्यकर्ताओं और पार्षदों को एकजुट रखने की है। बीएमसी के इतिहास में एमएनएस पार्षदों का दूसरी पार्टियों में जाना आम रहा है। ठाकरे ने “मराठी सांस” का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश की है।
जैसे-जैसे महायुति दशकों बाद मुंबई में अपना पहला मेयर बिठाने की तैयारी कर रही है, राज ठाकरे के लिए यह साबित करने की चुनौती है कि क्या उनका “मराठी गौरव” का नारा अभी भी मुंबई की सड़कों पर असर रखता है या नहीं।
