मुंबई: महाराष्ट्र में आज नगर निगम चुनावों के लिए मतदान हो रहा है, जिसमें बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) सहित राज्य के 28 अन्य नगर निगम शामिल हैं। इन चुनावों को केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इन्हें 2024 के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों और आगामी विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव माना जा रहा है। खास बात यह है कि इन चुनावों में सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी महाविकास आघाड़ी—दोनों ही गठबंधनों के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए हैं, जिससे कई नगर निगमों में मुकाबला बहुकोणीय बन गया है।
महायुति (भाजपा, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी) और महाविकास आघाड़ी (कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार गुट की एनसीपी)—दोनों ही गठबंधन इस बार एकजुट नजर नहीं आ रहे। कई स्थानों पर घटक दलों ने अलग-अलग उम्मीदवार उतार दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर टिकट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर असंतोष ने गठबंधनों की एकता को कमजोर किया है।
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “नगर निगम चुनावों में स्थानीय समीकरण अहम होते हैं। जब गठबंधन जमीन पर सामंजस्य नहीं बैठा पाते, तो सीधा असर वोटों के बंटवारे पर पड़ता है।”
बीएमसी चुनाव इस पूरे चुनावी दौर का केंद्र बिंदु बने हुए हैं। देश की सबसे अमीर नगर निगम मानी जाने वाली बीएमसी न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद प्रभावशाली है। दशकों तक शिवसेना का गढ़ रही बीएमसी अब त्रिकोणीय या उससे भी अधिक जटिल मुकाबले की ओर बढ़ रही है। शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट के बीच शिवसेना की विरासत को लेकर सीधी लड़ाई इस चुनाव को और रोचक बना रही है।
भाजपा भी बीएमसी में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है, जिससे मुकाबला और बिखर गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीएमसी का परिणाम महाराष्ट्र की शहरी राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
नगर निगम चुनावों में आमतौर पर पानी, सड़क, सफाई, स्वास्थ्य सेवाएं और स्थानीय बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दे हावी रहते हैं। हालांकि, इस बार राज्य की राजनीतिक उठा-पटक, सरकार में बदलाव और गठबंधनों की राजनीति भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर रही है।
एक पूर्व चुनाव अधिकारी का कहना है, “मतदाता स्थानीय सेवाओं से संतुष्टि या असंतोष के आधार पर वोट देता है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में दलों की स्थिरता और नेतृत्व भी एक बड़ा कारक बन गया है।” यही कारण है कि कई जगहों पर स्थानीय उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि पार्टी से ज्यादा अहम साबित हो रही है।
इन चुनावों की सबसे बड़ी विशेषता बहुकोणीय मुकाबले हैं। कई नगर निगमों में चार या उससे अधिक मजबूत दावेदार मैदान में हैं। इसका सीधा फायदा छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिल सकता है। वोटों के इस विभाजन से अप्रत्याशित परिणाम सामने आने की संभावना बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बहुकोणीय मुकाबलों में जीत का अंतर कम रह सकता है, जिससे बाद में सत्ता गठन के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति भी देखने को मिल सकती है। यह स्थिति नगर निगमों में स्थिर प्रशासन को लेकर सवाल खड़े कर सकती है।
महाराष्ट्र के ये नगर निगम चुनाव केवल स्थानीय सरकारों के गठन तक सीमित नहीं हैं। इन्हें विधानसभा चुनावों से पहले जनता के मूड को परखने का पैमाना माना जा रहा है। पार्टियों के लिए यह चुनाव यह तय करने में मदद करेंगे कि मौजूदा गठबंधन रणनीति कितनी कारगर है और कहां बदलाव की जरूरत है।
जैसे-जैसे मतदान आगे बढ़ रहा है, राजनीतिक दलों की नजर न केवल सीटों की संख्या पर है, बल्कि वोट शेयर और शहरी क्षेत्रों में जनाधार पर भी टिकी हुई है। इन चुनावों के नतीजे महाराष्ट्र की राजनीति में अगले कुछ वर्षों के लिए दिशा तय कर सकते हैं।
