मुंबई, 12 जनवरी 2026 — बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे ने एक साझा मंच से मराठी मतदाताओं को संबोधित करते हुए इस चुनाव को “मराठी नागरिकों के लिए आख़िरी चुनाव” करार दिया। दोनों नेताओं ने इस चुनाव को केवल नगर निकाय तक सीमित न मानकर इसे “भूमि, सत्ता और मराठी पहचान” की रक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किया।
दादर के शिवाजी पार्क में आयोजित इस रैली को राजनीतिक रूप से ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि दो दशक से अधिक समय बाद ठाकरे परिवार के ये दोनों प्रमुख नेता एक साथ सार्वजनिक मंच पर दिखाई दिए। लंबे समय से राजनीतिक मतभेदों के कारण अलग-अलग रास्तों पर चल रहे दोनों नेताओं का यह साझा संदेश आने वाले बीएमसी चुनाव को और अधिक रोचक बना रहा है।
रैली को संबोधित करते हुए राज ठाकरे ने कहा, “यह मराठी नागरिकों के लिए आख़िरी चुनाव है। अगर आज आप चूक गए, तो यह गलती हमेशा के लिए भारी पड़ेगी।” उन्होंने मराठी समाज से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि मुंबई में स्थानीय लोगों की राजनीतिक और सांस्कृतिक हिस्सेदारी लगातार कमजोर की जा रही है। उनके अनुसार, बीएमसी चुनाव मराठी समाज के भविष्य की दिशा तय करेगा।
उद्धव ठाकरे ने भी इसी भावना को दोहराते हुए कहा कि दोनों ने अपने मतभेद भुलाकर मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए साथ आने का फैसला किया है। उन्होंने कहा, “हम महाराष्ट्र और मुंबई के लिए एक साथ खड़े हैं। यह सत्ता की नहीं, बल्कि स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई है।” उद्धव ठाकरे ने मराठी मतदाताओं से अपील की कि वे भावनाओं के साथ-साथ नगर प्रशासन के भविष्य को भी ध्यान में रखें।
रैली में तीन प्रमुख मुद्दे उभरकर सामने आए — भूमि अधिकार, स्थानीय सत्ता में भागीदारी और मराठी पहचान। ठाकरे नेताओं ने आरोप लगाया कि बाहरी प्रभाव और राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में मुंबई की स्थानीय पहचान को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि नगर प्रशासन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में मराठी समाज की भूमिका कम होती जा रही है।
राज ठाकरे ने भाषा के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया और मराठी भाषा के सम्मान और संरक्षण की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा को थोपने का प्रयास सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है। यह बयान जहां उनके समर्थकों के बीच जोश पैदा करता दिखा, वहीं राजनीतिक विरोधियों ने इसे विभाजनकारी बयान बताया।
ठाकरे बंधुओं के इस संयुक्त मंच पर आने के बाद राज्य की राजनीति में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। सत्तारूढ़ दलों ने इसे चुनावी रणनीति बताते हुए कहा कि भावनात्मक मुद्दों से ध्यान हटाकर विकास और प्रशासन पर चर्चा होनी चाहिए। वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि बीएमसी में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद शहरी समस्याओं के समाधान पर ठोस काम नहीं हुआ है।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ठाकरे नेताओं की यह एकजुटता मराठी मतदाताओं के बीच असर डाल सकती है, लेकिन यह भी सच है कि मुंबई की राजनीति अब केवल पहचान तक सीमित नहीं रही है। शहरी मतदाता बुनियादी सुविधाओं, पारदर्शिता और प्रशासनिक दक्षता जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देता है।
बीएमसी चुनाव देश के सबसे महत्वपूर्ण नगर निकाय चुनावों में गिने जाते हैं। मुंबई जैसी आर्थिक राजधानी का प्रशासन संभालने वाली यह संस्था शहर के बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन से जुड़े बड़े फैसले लेती है। इसी कारण बीएमसी पर नियंत्रण को राजनीतिक ताकत का प्रतीक माना जाता है।
ठाकरे परिवार की राजनीति दशकों से मराठी पहचान से जुड़ी रही है। शिवसेना की स्थापना से लेकर आज तक मराठी अस्मिता इस राजनीति का केंद्र रही है। वर्तमान में उद्धव और राज ठाकरे का एक मंच पर आना इस बात का संकेत है कि बदलते राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दल नई रणनीतियां अपना रहे हैं।
जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, मुंबई की सड़कों और राजनीतिक मंचों पर बयानबाज़ी तेज होती जा रही है। यह चुनाव यह तय करेगा कि मराठी पहचान का मुद्दा मतदाताओं को कितना प्रभावित करता है या शहरी शासन से जुड़े व्यावहारिक सवाल अधिक निर्णायक साबित होंगे।
