मुंबई: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक हालिया साक्षात्कार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि पार्टी “मुंबई से मराठियों को बाहर करने की साजिश” कर रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक वे सक्रिय राजनीति में हैं, तब तक मुंबई पर किसी बाहरी ताकत का “कब्जा” संभव नहीं होगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन, पहचान और शहरी राजनीति को लेकर बहस तेज होती जा रही है।
उद्धव ठाकरे ने कहा, “भाजपा मराठियों को मुंबई से हाशिये पर धकेलने की कोशिश कर रही है। जब तक मैं यहां हूं, वे मुंबई पर कब्जा नहीं कर सकते।” उनके इस बयान को न केवल राजनीतिक आरोप के तौर पर, बल्कि मराठी अस्मिता और मुंबई की सामाजिक-आर्थिक संरचना से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।
साक्षात्कार में उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के साथ रिश्तों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि दोनों के बीच लंबे समय तक राजनीतिक मतभेद रहे, लेकिन मराठी पहचान और महाराष्ट्र के हितों को लेकर दोनों कभी अलग नहीं हुए। उद्धव ठाकरे के अनुसार, “राज और मैं अलग जरूर थे, लेकिन मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और महाराष्ट्र को हमने कभी नहीं छोड़ा। हम एक उद्देश्य के लिए फिर साथ आए हैं।”
इस पृष्ठभूमि को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि मुंबई लंबे समय से मराठी राजनीति का केंद्र रही है। शिवसेना की स्थापना ही 1960 के दशक में मराठी मानुष के अधिकारों को लेकर हुई थी। समय के साथ, मुंबई एक वैश्विक महानगर बन गई, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग रोजगार और अवसरों की तलाश में आए। इस बदलाव ने शहर की जनसांख्यिकी और राजनीति दोनों को प्रभावित किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उद्धव ठाकरे का यह बयान शहरी मतदाताओं, खासकर मराठी मध्यम वर्ग और युवाओं को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “मुंबई में पहचान की राजनीति हमेशा चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है। ठाकरे परिवार की राजनीति का केंद्र मराठी अस्मिता रही है, और मौजूदा बयान उसी विरासत को दोबारा मजबूत करने की कोशिश है।”
भाजपा की ओर से हालांकि इन आरोपों को खारिज किया गया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा की राजनीति विकास, समावेश और सुशासन पर आधारित है, न कि किसी समुदाय को बाहर करने पर। भाजपा का तर्क है कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है और यहां सभी भारतीयों का समान अधिकार है।
इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू शिवसेना (यूबीटी) और मनसे के बीच बढ़ती नजदीकी है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों दलों के अलग-अलग रास्तों ने मराठी वोटों का विभाजन किया था। अब, साझा मुद्दों पर एकजुटता का संकेत देकर उद्धव ठाकरे एक व्यापक मराठी राजनीतिक मंच तैयार करने की कोशिश में दिख रहे हैं। इसका असर आने वाले नगर निकाय और विधानसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि उद्धव ठाकरे का यह आक्रामक रुख भाजपा के शहरी विस्तार और राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने का प्रयास भी है। महाराष्ट्र में सत्ता समीकरण बदलने के बाद विपक्षी दल नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं, जिसमें भावनात्मक और पहचान से जुड़े मुद्दों को फिर से केंद्र में लाया जा रहा है।
फिलहाल, उद्धव ठाकरे के बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि मुंबई की पहचान, मराठी समाज की भूमिका और शहरी भारत की बदलती राजनीति से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह बयान राजनीतिक रणनीति साबित होता है या केवल बयानबाजी तक ही सीमित रहता है।
