महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों से ठीक पहले, राज्य की राजनीति में पहचान और धर्म का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। शिव सेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा के “हिंदू मेयर” वाले बयान पर पलटवार करते हुए पूछा है कि क्या मराठी भाषी लोगों को अब हिंदू नहीं माना जाता। अपने चचेरे भाई और मनसे (MNS) प्रमुख राज ठाकरे के साथ एक ऐतिहासिक संयुक्त साक्षात्कार में, उद्धव ने भाजपा पर मराठी अस्मिता और हिंदू पहचान के बीच एक “कृत्रिम विभाजन” पैदा करने का आरोप लगाया।
यह साक्षात्कार मुंबई के प्रतिष्ठित शिव सेना भवन में आयोजित किया गया था, जहाँ लगभग दो दशकों के बाद दोनों ठाकरे भाई एक साथ नजर आए। 15 जनवरी, 2026 को होने वाले 27 नगर निगमों के चुनाव, विशेष रूप से बीएमसी (BMC), के लिए इस गठबंधन ने “मराठी पहले” का संदेश देकर चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
“मराठी या हिंदू” का विवाद
विवाद तब शुरू हुआ जब भाजपा नेताओं, विशेष रूप से देवेंद्र फडणवीस ने दावा किया कि मुंबई का अगला मेयर “मराठी और हिंदू” दोनों होगा। इस पर उद्धव ठाकरे ने कड़ा ऐतराज जताया।
उद्धव ठाकरे ने कहा, “मुंबई का मेयर मराठी ही होगा। लेकिन मैं भाजपा से पूछता हूँ—क्या मराठी व्यक्ति हिंदू नहीं है? जब आप मराठी नेता की बात करते हैं, तो आपको अलग से ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या आप यह सुझाव दे रहे हैं कि आपकी नजर में मराठी मानुस अपनी धार्मिक पहचान खो चुका है?”
उन्होंने आगे कहा कि भाजपा महाराष्ट्र के गौरव और मराठी पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के शहीदों का जिक्र करते हुए भाजपा को उस इतिहास की याद दिलाई जहाँ मराठी पहचान के लिए संघर्ष किया गया था।
राज और उद्धव का पुनर्मिलन: “अब नहीं तो कभी नहीं”
राज और उद्धव ठाकरे का साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ है। दोनों नेताओं ने स्पष्ट किया कि यह केवल राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि महाराष्ट्र को “बाहरी प्रभाव” से बचाने के लिए एक भावनात्मक जरूरत है।
साक्षात्कार के दौरान राज ठाकरे ने कहा, “यह चुनाव महाराष्ट्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है—इसे हम ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ की स्थिति कह सकते हैं। यदि हम आज एकजुट नहीं हुए, तो महाराष्ट्र हमें कभी माफ नहीं करेगा।”
सांस्कृतिक पहचान और हिंदी का प्रभाव
उद्धव ठाकरे ने शहर के भीतर मराठी भाषा और संस्कृति के कमजोर होने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि मुंबई के कुछ इलाकों में हिंदी को थोपा जा रहा है और शहर की मूल पहचान को मिटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई अन्य भाषाओं के लोगों के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जो मुंबई को केवल एक व्यापारिक वस्तु (Traders’ pocket) के रूप में देखते हैं।
भाजपा का जवाब: “विचारधारा का अभाव”
सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन ने इस ‘ठाकरे गठबंधन’ को “वैचारिक रूप से दिवालिया” बताया है। भाजपा का तर्क है कि उद्धव ने अपनी सत्ता बचाने के लिए हिंदुत्व के मुद्दों को छोड़ दिया है। देवेंद्र फडणवीस ने अपने रुख को दोहराते हुए कहा कि महायुति का मेयर हिंदू और मराठी दोनों होगा और इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।
निष्कर्ष: बीएमसी का महामुकाबला
50,000 करोड़ रुपये से अधिक के बजट वाली बीएमसी पर कब्जा करना किसी भी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। 15 जनवरी के चुनाव यह तय करेंगे कि क्या “मराठी अस्मिता” का भाव भाजपा के विकास और हिंदुत्व के संयुक्त एजेंडे पर भारी पड़ेगा।
