मुंबई — महाराष्ट्र में होने वाले 2026 के निकाय चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल उस समय गर्मा गया, जब महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नारवेकर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के गंभीर आरोप लगाए गए। विपक्षी दलों का आरोप है कि बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों में उन्होंने अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए अपने परिवार के सदस्यों को लाभ पहुँचाने का प्रयास किया।
विवाद का केंद्र दक्षिण मुंबई का कोलाबा विधानसभा क्षेत्र है, जहाँ बीएमसी के तीन वार्डों में राहुल नारवेकर के तीन करीबी पारिवारिक सदस्य चुनाव मैदान में हैं। आरोप है कि इन वार्डों में नामांकन प्रक्रिया के दौरान अन्य उम्मीदवारों को प्रभावी रूप से रोका गया, जिससे मुकाबला सीमित रह गया और नारवेकर के परिवार के उम्मीदवारों को न्यूनतम विरोध का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) सहित कई विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा हमला बताया है। उनका कहना है कि स्थानीय निकाय चुनाव लोकतंत्र की जड़ होते हैं और यदि इस स्तर पर निष्पक्षता से समझौता होता है, तो इसका असर पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है।
मुंबई कांग्रेस की एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “यह केवल एक चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे लोग चुनावी प्रक्रिया से स्वयं को अलग रख पा रहे हैं या नहीं।” विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बावजूद नियमों का पालन नहीं किया गया और प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बनाया गया।
आम आदमी पार्टी ने भी आरोप लगाया है कि उनके उम्मीदवार को सभी आवश्यक दस्तावेज पूरे होने के बावजूद समय पर नामांकन दाखिल करने से रोका गया। पार्टी का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो कई गंभीर अनियमितताएँ सामने आ सकती हैं।
हालांकि, राहुल नारवेकर ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि ये आरोप पूरी तरह राजनीतिक हैं और उनका उद्देश्य उनकी छवि को नुकसान पहुँचाना है। नारवेकर का कहना है कि वे केवल पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के समर्थन में मौजूद थे और उन्होंने किसी भी अधिकारी या चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया।
राज्य चुनाव आयोग ने इस पूरे मामले पर सतर्क रुख अपनाया है। आयोग का कहना है कि फिलहाल स्पीकर के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई है, लेकिन नामांकन प्रक्रिया के दौरान संबंधित अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की जा रही है। आयोग ने यह भी दोहराया कि चुनावों की निष्पक्षता बनाए रखना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
इस विवाद ने महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों में निर्विरोध जीत के बढ़ते मामलों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। कई वरिष्ठ नेताओं ने इसे “लोकतंत्र का अपमान” बताते हुए ऐसे वार्डों में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है।
पृष्ठभूमि की बात करें तो बीएमसी देश की सबसे समृद्ध नगर निकायों में से एक है और इसका राजनीतिक महत्व बेहद अधिक है। बीएमसी पर नियंत्रण को मुंबई की राजनीति में शक्ति संतुलन के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि इसके चुनाव हमेशा तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आरोप-प्रत्यारोप के साथ जुड़े रहते हैं।
आगामी मतदान और मतगणना की तारीखें नजदीक आने के साथ ही यह विवाद और तेज होने की संभावना है। फिलहाल, यह मामला केवल एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने यह व्यापक बहस छेड़ दी है कि संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं से चुनावी निष्पक्षता को लेकर कैसी अपेक्षाएँ रखी जानी चाहिए।
