पटना — बिहार में हालिया चुनावी हार के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके प्रमुख सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है। कांग्रेस के पूर्व विधायक दल नेता शकील अहमद खान द्वारा गठबंधन पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए जाने के बाद महागठबंधन की एकजुटता पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब विपक्ष आगामी चुनावों के लिए अपनी रणनीति को दोबारा परिभाषित करने में जुटा है।
शकील अहमद खान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि RJD के साथ गठबंधन ने बिहार में कांग्रेस को राजनीतिक रूप से कमजोर किया है और पार्टी का पारंपरिक आधार लगातार सिमटता गया है। उनके अनुसार, गठबंधन के बावजूद कांग्रेस न तो अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सकी और न ही संगठनात्मक मजबूती हासिल कर पाई।
उन्होंने कहा, “RJD के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया है और पार्टी की स्वतंत्र पहचान कमजोर हुई है। शीर्ष नेतृत्व को इस संबंध में गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।”
कांग्रेस के भीतर इस बयान को पार्टी की लंबे समय से चली आ रही बेचैनी के रूप में देखा जा रहा है। बिहार में कांग्रेस दशकों पहले एक मजबूत राजनीतिक ताकत हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ उसका जनाधार घटता चला गया। क्षेत्रीय दलों के उभार और बदलते सामाजिक समीकरणों ने कांग्रेस की भूमिका को सीमित कर दिया। महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी, जिससे अंदरूनी असंतोष और तेज हो गया है।
वहीं, RJD ने शकील अहमद खान के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि गठबंधन ने परिस्थितियों के अनुरूप अपना योगदान दिया और कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति के लिए दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए। RJD की ओर से यह भी कहा गया है कि गठबंधन जारी रखना या नहीं रखना पूरी तरह कांग्रेस का आंतरिक फैसला है।
RJD के एक वरिष्ठ नेता ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कांग्रेस यदि चाहे तो स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ सकती है। हमने कभी किसी पर दबाव नहीं डाला।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस की दीर्घकालिक राजनीतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। बड़े क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करते हुए कांग्रेस अक्सर जूनियर पार्टनर की भूमिका में आ जाती है, जिससे उसकी अलग राजनीतिक छवि धुंधली हो जाती है। बिहार में भी यही स्थिति देखने को मिली, जहां चुनावी अभियान और सीट बंटवारे में कांग्रेस की भूमिका सीमित रही।
महागठबंधन का इतिहास 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों से जुड़ा है, जब RJD, कांग्रेस और अन्य दलों ने एकजुट होकर भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन के खिलाफ सत्ता हासिल की थी। हालांकि, समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और गठबंधन की एकजुटता में दरारें उभरने लगीं। बाद के चुनावों में सत्ता संतुलन बदला और विपक्ष को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों, स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय मुद्दों पर आधारित रही है। RJD की मजबूत सामाजिक पकड़ के मुकाबले कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ा है। ऐसे में गठबंधन कांग्रेस को तत्काल राजनीतिक अस्तित्व तो देता है, लेकिन दीर्घकाल में उसकी स्वतंत्र मजबूती को सीमित कर देता है।
कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि पार्टी चुनाव परिणामों की समीक्षा कर रही है और भविष्य की रणनीति पर मंथन जारी है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि गठबंधन को केवल चुनावी समझौते तक सीमित रखना चाहिए, जबकि संगठन को जमीनी स्तर पर फिर से खड़ा करने पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर बिहार को लेकर रणनीतिक मतभेद गहराते जा रहे हैं।
दूसरी ओर, RJD ने यह भी दोहराया है कि विपक्षी एकता समय की मांग है और बिखराव का सीधा लाभ सत्तारूढ़ गठबंधन को मिलेगा। हालांकि, पार्टी ने यह भी साफ किया है कि वह किसी सहयोगी को मजबूरी में साथ रखने के पक्ष में नहीं है।
जैसे-जैसे आने वाले चुनाव नजदीक आएंगे, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस अपने पुराने सहयोगी के साथ आगे बढ़ती है या फिर स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुनती है। फिलहाल, बिहार की राजनीति में यह टकराव विपक्षी खेमे के भीतर गहरे मंथन का संकेत दे रहा है।
