बेंगलुरु — कर्नाटक में जल्द ही बड़े पैमाने पर कैबिनेट फेरबदल होने की अटकलें तेज़ हो गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ और नव-निर्वाचित विधायक लगातार दिल्ली पहुंच रहे हैं, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि सत्ता संतुलन को लेकर अंदरूनी चर्चा अपने चरम पर है। सिद्धरामय्या सरकार की 34 सदस्यीय कैबिनेट में फिलहाल 16 पद खाली बताए जाते हैं, साथ ही दो और पद पूर्व मंत्रियों के इस्तीफे के बाद रिक्त हो चुके हैं। इस स्थिति ने राजनीतिक सक्रियता को और बढ़ा दिया है।
दिल्ली में कांग्रेस विधायकों की गतिविधि तेज
पिछले कुछ दिनों से कई विधायक दिल्ली का रुख कर रहे हैं। इनमें अनुभवी नेता, पूर्व मंत्री और पहली बार विधानसभा पहुँचे युवा चेहरे शामिल हैं। सभी अपने-अपने क्षेत्र और जातीय समीकरण के आधार पर मंत्री पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कुछ विधायकों ने उच्च नेतृत्व से मुलाकात कर अपने तर्क रखे हैं, जबकि कई अन्य अपॉइंटमेंट का इंतज़ार कर रहे हैं।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
“फेरबदल लंबे समय से लंबित है। पार्टी कार्यकर्ताओं और विधायकों की अपेक्षा है कि प्रदर्शन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर सही निर्णय लिया जाए।”
सत्ता संतुलन और गुटीय समीकरण अहम
कर्नाटक कांग्रेस में दो प्रमुख धड़ों — सिद्धरामय्या गुट और उप मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार समर्थक समूह — के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। हालांकि दोनों नेता बार-बार एकजुटता का संदेश देते रहे हैं, लेकिन विधायकों की बढ़ती सक्रियता यह दिखाती है कि शक्ति-संतुलन को लेकर प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से मौजूद है।
यह भी माना जा रहा है कि कुछ विधायक मुख्यमंत्री के नेतृत्व में अपना भविष्य सुरक्षित मानते हैं, जबकि कुछ नई पीढ़ी के विधायकों का झुकाव उप मुख्यमंत्री के संगठनात्मक प्रभाव की ओर है।
फेरबदल के संभावित आधार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संभावित फेरबदल में निम्न कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं:
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क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, विशेषकर बेंगलुरु और उत्तरी कर्नाटक
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जातीय संतुलन, जो राज्य की राजनीति में अत्यंत संवेदनशील विषय है
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युवा बनाम अनुभवी चेहरों का अनुपात
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प्रदर्शन आधारित पुनर्मूल्यांकन, जिसमें कुछ वर्तमान मंत्रियों की संभावित छुट्टी हो सकती है
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आगामी स्थानीय निकाय और लोकसभा चुनावों की रणनीति
पृष्ठभूमि: क्यों बढ़ी चर्चा?
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के गठन को लगभग डेढ़ वर्ष हो चुके हैं। इस अवधि में कई बार फेरबदल की चर्चा उठी, लेकिन पार्टी ने इसे टाल दिया।
दो मंत्रियों के इस्तीफे और कई विभागों के लम्बे समय से अतिरिक्त प्रभार में रहने के कारण अब फेरबदल को अनिवार्य माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पार्टी आने वाले महीनों में चुनावी मोर्चों पर मजबूती चाहती है, तो उसे मंत्रिमंडल में ऊर्जा और नए चेहरे शामिल करने होंगे।
उच्च नेतृत्व की भूमिका सबसे अहम
दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व की भूमिका को देखते हुए, अंतिम निर्णय सीधा उच्च कमान पर निर्भर करेगा। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री दोनों ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि वे निर्णय को पूरी तरह पार्टी नेतृत्व पर छोड़ते हैं।
एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक,
“कर्नाटक में सत्ता संतुलन बेहद संवेदनशील है। कोई भी छोटा निर्णय पूरे दक्षिण भारत में कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को प्रभावित कर सकता है।”
आगे क्या?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि फेरबदल जल्द ही हो सकता है, जबकि कुछ सूत्र कहते हैं कि इसे चरणबद्ध रूप से लागू किया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि कांग्रेस नेतृत्व एक ऐसा संतुलन तलाश रहा है जहाँ संगठन और सरकार दोनों को लाभ मिले।
फिलहाल, सभी की निगाहें दिल्ली पर टिकी हुई हैं — जहाँ होने वाला हर संकेत कर्नाटक की राजनीति की दिशा तय करेगा।
