मुंबई — महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति एक बार फिर गर्माती दिखाई दे रही है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर स्थानीय निकाय चुनावों में लगभग 100 उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के बाद “वंशवादी राजनीति” और “दबाव की रणनीति” अपनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह घटनाक्रम विपक्षी दलों के तीखे विरोध का कारण बना है और महायुति सरकार की चुनावी कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कुछ सीटों पर निर्विरोध जीत होना सामान्य बात है, लेकिन इस बार BJP उम्मीदवारों की असामान्य रूप से बड़ी संख्या में ऐसी जीत ने विवाद को तेज कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा की तेज़ी से बढ़ती राजनीतिक पकड़ महज़ राजनीतिक लोकप्रियता का परिणाम नहीं है, बल्कि प्रतिद्वंद्वियों पर दबाव डालकर और नेताओं के परिजनों को आगे बढ़ाकर हासिल की गई है।
कई विपक्षी नेताओं ने दावा किया है कि उनके दलों के इच्छुक उम्मीदवारों ने नामांकन दबाव, भय या प्रशासनिक बाधाओं के कारण वापस ले लिया। उनका कहना है कि यह स्थिति प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करती है। कुछ नेताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि वरिष्ठ भाजपा नेताओं के परिजन ही कैसे ऐसे समय में निर्विरोध जीत दर्ज कर रहे हैं, जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से तेज होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद महाराष्ट्र की राजनीतिक कहानी में एक बड़े विरोधाभास की ओर इशारा करता है। भाजपा अक्सर अन्य दलों पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है, लेकिन विपक्ष का दावा है कि अब वही प्रवृत्ति भाजपा के भीतर स्थानीय स्तर तक दिखाई दे रही है। प्रमुख राजनीतिक परिवारों से जुड़े उम्मीदवारों की निर्विरोध जीत ने इस बहस को और गहरा कर दिया है।
उधर, भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि निर्विरोध जीतें उनके संगठनात्मक ढांचे, मतदान केंद्र स्तर पर मजबूत उपस्थिति और जनविश्वास का प्रमाण हैं। उनके अनुसार, कई क्षेत्रों में विपक्ष उपयुक्त उम्मीदवार तक नहीं खोज पा रहा है, जिससे भाजपा के उम्मीदवार स्वतः निर्विरोध चुने जा रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि किसी उम्मीदवार का परिवार से राजनीतिक संबंध होना लोकतांत्रिक रूप से अयोग्यता का कारण नहीं हो सकता।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों की संरचना को लेकर भी यह विवाद नई चर्चा छेड़ रहा है। नगर परिषदों और नगर पंचायतों जैसी संस्थाएं स्थानीय शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जहां चुनावी प्रतिस्पर्धा पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि निर्विरोध जीत का यह रुझान बढ़ता है, तो इससे लोकतांत्रिक भागीदारी सीमित हो सकती है।
वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष यह मुद्दा इसलिए उठा रहा है क्योंकि उसे जनसमर्थन कम होता दिखाई दे रहा है। भाजपा समर्थकों के अनुसार, पार्टी का अनुशासन, बूथस्तरीय नेटवर्क और विकास-केन्द्रित अभियान जनता को आकर्षित कर रहा है।
जैसे-जैसे महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव आगे बढ़ रहे हैं, दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति पर दृढ़ दिखाई दे रहे हैं। विपक्ष के लिए वंशवाद और भय की राजनीति के आरोप महायुति सरकार पर दबाव का प्रमुख साधन बन गए हैं, जबकि भाजपा इन निर्विरोध जीतों को जनता के विश्वास का संकेत मान रही है।
यह विवाद महाराष्ट्र में स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की सेहत पर व्यापक चर्चा को जन्म दे चुका है। चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता, उम्मीदवारों के लिए समान अवसर और दबाव-मुक्त राजनीतिक माहौल की आवश्यकता एक बार फिर प्रमुख सवाल बनकर सामने आई है।
