चंडीगढ़ — संगठन के पुनर्निर्माण के बाद अब जमीनी स्तर पर राजनीतिक लामबंदी की दिशा में कदम बढ़ाते हुए शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए जल्द अभियान शुरू करने की रणनीति तैयार कर ली है। हाल ही में हुए ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों में मिले सकारात्मक संकेतों से उत्साहित अकाली दल फरवरी से राज्यव्यापी रैलियों की श्रृंखला शुरू करने जा रहा है, जिसकी शुरुआत मालवा क्षेत्र से होगी। मालवा लंबे समय से पार्टी का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है।
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि ग्रामीण निकाय चुनावों में प्रदर्शन ने यह संकेत दिया है कि अकाली दल का पारंपरिक जनाधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे समय में, जब शहरी स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक हैं, अकाली दल इन रैलियों के माध्यम से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने और जनता के बीच अपनी राजनीतिक उपस्थिति को दोबारा मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है।
अकाली दल पिछले कुछ वर्षों से लगातार राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। 2020–21 के किसान आंदोलन और इसके बाद भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद पार्टी को संगठनात्मक और चुनावी दोनों स्तरों पर नुकसान उठाना पड़ा। 2022 के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन ने पार्टी को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया, जिसके बाद नेतृत्व और संगठन के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की गई।
पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा,
“ग्रामीण चुनावों ने यह दिखाया है कि जनता अकाली दल को पूरी तरह खारिज नहीं कर चुकी है। अब ज़रूरत है सीधे जनता से संवाद बढ़ाने और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की।”
उनके अनुसार, आगामी रैलियां केवल चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि पार्टी और जनता के बीच टूटी कड़ी को फिर से जोड़ने का प्रयास हैं।
मालवा क्षेत्र से अभियान की शुरुआत को रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। पंजाब की विधानसभा सीटों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में आता है और यहां का रुझान राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है। अकाली दल का लक्ष्य है कि कृषि संकट, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कानून-व्यवस्था और राज्य के संघीय अधिकारों जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर जनता से संवाद किया जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अकाली दल का यह शुरुआती अभियान उसे अन्य दलों की तुलना में बढ़त दिला सकता है। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार,
“जल्दी मैदान में उतरने से पार्टी को संगठन को मज़बूत करने, नेतृत्व को ज़मीन पर उतारने और मतदाताओं की नब्ज़ समझने का समय मिलेगा।”
हालांकि, अकाली दल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार राज्य में सत्तारूढ़ है और कांग्रेस तथा भाजपा भी अपने-अपने स्तर पर संगठन को सक्रिय कर रही हैं। ऐसे में अकाली दल को न केवल अपनी खोई हुई विश्वसनीयता वापस पानी होगी, बल्कि युवाओं और शहरी मतदाताओं तक भी अपनी पहुंच बढ़ानी होगी।
पार्टी नेतृत्व का दावा है कि आगामी रैलियों में वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ स्थानीय चेहरों को भी मंच दिया जाएगा, ताकि पार्टी को केवल एक पारंपरिक या सीमित दायरे वाली ताकत के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक जनाधार वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। इसके साथ ही, डिजिटल और सोशल मीडिया के ज़रिए भी युवाओं से जुड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, अकाली दल का यह कदम 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए एक लंबी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के लिए यह अभियान न केवल चुनावी सफलता की दिशा में प्रयास है, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करने की कोशिश भी है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह रणनीति अकाली दल को पंजाब की राजनीति में दोबारा केंद्र में ला पाती है या नहीं।
