तिरुवनंतपुरम: केरल की राजनीतिक और मीडिया जगत में नए साल की शुरुआत एक असामान्य संपादकीय चूक के साथ हुई, जिसने पुराने राजनीतिक विवादों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े मलयालम दैनिक जनमभूमि में 1 जनवरी को मुस्लिम लीग से जुड़े अख़बार चंद्रिका का संपादकीय पृष्ठ प्रकाशित हो गया। इस अप्रत्याशित घटना ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि वाम दलों को भी प्रतिद्वंद्वी दलों की मीडिया रणनीतियों पर तंज कसने का मौका दे दिया।
इस घटना के सामने आते ही जनमभूमि प्रबंधन ने सफाई देते हुए कहा कि यह गलती प्लेट-मेकिंग सेंटर में तकनीकी चूक के कारण हुई है। अख़बार प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की आंतरिक जाँच की जा रही है और जिम्मेदार एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अख़बार के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा,
“यह एक अनजाने में हुई तकनीकी गलती है, जिसका हमारे संपादकीय दृष्टिकोण या विचारधारा से कोई संबंध नहीं है।”
इस घटनाक्रम पर वामपंथी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया और पार्टी मंचों पर वाम नेताओं ने इसे “राजनीतिक विडंबना” करार दिया और याद दिलाया कि कैसे पहले भी मीडिया से जुड़ी गलतियों पर राजनीतिक बयानबाज़ी होती रही है। वाम दलों के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,
“जब वैचारिक अख़बारों में ऐसी चूक होती है, तो यह केवल तकनीकी मामला नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जाता है।”
हालांकि, वाम दलों ने यह भी स्वीकार किया कि मीडिया संस्थानों में तकनीकी त्रुटियाँ संभव हैं, लेकिन उनका कहना था कि वैचारिक रूप से स्पष्ट अख़बारों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में वर्ष 2010 की एक पुरानी चूक को भी ताजा कर दिया, जब एक वामपंथी समर्थित अख़बार में विरोधी दल से जुड़ा कंटेंट गलती से प्रकाशित हो गया था। उस समय भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इसे लेकर कड़ी आलोचना की थी और वाम दलों पर वैचारिक भ्रम का आरोप लगाया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मीडिया से जुड़ी ऐसी घटनाएँ अक्सर तात्कालिक विवाद पैदा करती हैं, लेकिन लंबे समय में ये प्रेस की विश्वसनीयता और संपादकीय सतर्कता पर सवाल खड़े करती हैं।
केरल जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में, अख़बार केवल समाचार का माध्यम नहीं बल्कि वैचारिक विमर्श का भी केंद्र रहे हैं। जनमभूमि, चंद्रिका और वामपंथी अख़बार दशकों से अपनी-अपनी राजनीतिक सोच का प्रतिनिधित्व करते आए हैं। ऐसे में एक अख़बार में दूसरे दल से जुड़ा संपादकीय छप जाना असामान्य और संवेदनशील माना जाता है।
मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक प्रिंटिंग प्रक्रिया में थर्ड-पार्टी तकनीकी एजेंसियों की भूमिका बढ़ी है, जिससे ऐसी गलतियों की संभावना रहती है। एक वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक के अनुसार,
“डिजिटल और ऑफसेट प्रिंटिंग के दौर में संपादकीय नियंत्रण और तकनीकी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।”
जनमभूमि प्रबंधन ने भरोसा दिलाया है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अतिरिक्त जांच प्रणाली लागू की जाएगी। वहीं, राजनीतिक दल इस प्रकरण को फिलहाल बयानबाज़ी तक सीमित रखते दिख रहे हैं।
हालांकि यह घटना एक तकनीकी गलती के रूप में सामने आई है, लेकिन केरल की राजनीति में मीडिया और विचारधारा के गहरे संबंध को देखते हुए, यह मामला केवल एक संपादकीय चूक भर नहीं रह गया है। यह एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि वैचारिक पत्रकारिता के दौर में संपादकीय सतर्कता कितनी अहम है।
