नई दिल्ली – सोमवार को संसद के बजट सत्र के दूसरे भाग की शुरुआत हंगामेदार होने की उम्मीद है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा करेगी। कांग्रेस सदस्य मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव ने सत्ता पक्ष और विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।
बजट सत्र के पहले चरण के दौरान, विपक्ष ने 118 सदस्यों के हस्ताक्षरित नोटिस को जमा किया था। शनिवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा इस प्रस्ताव को समर्थन देने की घोषणा के बाद विपक्षी खेमे को नई मजबूती मिली है। हालांकि, संसदीय आंकड़ों पर गौर करें तो यह प्रस्ताव बिरला की कुर्सी के लिए खतरे से ज्यादा विरोध का एक प्रतीकात्मक संकेत नजर आता है।
संवैधानिक प्रावधान और प्रक्रिया
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(सी) द्वारा संचालित होती है। इसके लिए सदन के “तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत” द्वारा पारित एक संकल्प की आवश्यकता होती है। संवैधानिक नियमों के अनुसार, चर्चा के दौरान ओम बिरला सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे। वे सदस्यों के बीच बैठेंगे, हालांकि उन्हें कार्यवाही के दौरान अपना पक्ष रखने और बचाव करने का पूरा अधिकार होगा।
पूर्व लोकसभा महासचिव और संवैधानिक विशेषज्ञ पीडीटी अचारी ने इस कदम पर टिप्पणी करते हुए कहा: “अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव एक दुर्लभ और गंभीर संसदीय घटना है। यह चेयर और विपक्ष के बीच विश्वास के पूर्ण अभाव को दर्शाता है। भले ही संख्या बल सरकार के पक्ष में हो, लेकिन यह बहस निष्पक्षता के सिद्धांतों के प्रति जवाबदेही तय करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है।”
संख्या बल: एनडीए बनाम इंडिया
543 सदस्यीय लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 है। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास 293 सांसदों के साथ स्पष्ट बढ़त है। इसमें भाजपा के 240, जदयू (JD-U) के 16 और टीडीपी (TDP) के 12 सांसद शामिल हैं।
दूसरी ओर, टीएमसी के समर्थन के बावजूद विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के पास लगभग 238 सांसद हैं। 34 मतों के अंतर के कारण, इस प्रस्ताव के गिरने की पूरी संभावना है। हालांकि, भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों को ‘थ्री-लाइन व्हिप’ जारी कर सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।
पक्षपात के आरोप
विपक्ष का मुख्य आरोप है कि अध्यक्ष का व्यवहार पक्षपातपूर्ण रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने बिरला पर आरोप लगाया है कि वे महत्वपूर्ण बहसों के दौरान विपक्ष का समय कम करते हैं और सत्ता पक्ष का पक्ष लेते हैं। वहीं, सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अध्यक्ष ने लगातार सदन की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने का प्रयास किया है।
एक दुर्लभ संसदीय मिसाल
भारतीय संसद के इतिहास में अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव बहुत कम आए हैं। अध्यक्ष का पद दलीय राजनीति से ऊपर माना जाता है। भले ही यह प्रस्ताव विफल हो जाए, लेकिन सोमवार की कार्यवाही एनडीए के फ्लोर मैनेजमेंट और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता की अग्निपरीक्षा होगी। जैसे ही सोमवार दोपहर सदन की कार्यवाही शुरू होगी, पूरे देश की नजरें इस आंतरिक लोकतांत्रिक चुनौती पर टिकी होंगी।
