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यूपी में अफसरशाही पर सत्ता-विपक्ष नाराज़

In Politics
February 28, 2026
rajneetiguru.com - यूपी में अफसरशाही से सत्ता और विपक्ष दोनों नाराज़। Image Credit – The Indian Express

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक असामान्य स्थिति उभरती दिख रही है, जहाँ सत्तारूढ़ दल और विपक्ष—दोनों के विधायक—राज्य की अफसरशाही पर उदासीनता और जवाबदेही की कमी के आरोप लगा रहे हैं। शिकायतों का स्वर अलग-अलग हो सकता है, लेकिन चिंता का मूल कारण एक जैसा है—मैदान में प्रशासनिक मशीनरी का अपेक्षित रूप से सक्रिय न होना।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर यह चिंता गहराती जा रही है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कई जिलों में अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। पार्टी के भीतर यह धारणा बन रही है कि एक “टॉप-हेवी” शासन संरचना के चलते निचले स्तर की अफसरशाही केवल ऊपर से आने वाले निर्देशों पर निर्भर होती जा रही है, जिससे स्थानीय समस्याओं का समाधान प्रभावित हो रहा है।

वहीं विपक्षी दलों का आरोप इससे भी आगे जाता है। उनका कहना है कि प्रशासनिक उदासीनता अब एक “आदत” बन चुकी है और मौजूदा सरकार के पास इसे सुधारने का समय लगभग निकल चुका है। विपक्ष का दावा है कि यह स्थिति न केवल शासन की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी कमजोर करती है।

एक विपक्षी विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “आज हालात ऐसे हैं कि अधिकारी न तो फोन उठाते हैं और न ही ज़मीनी समस्याओं पर त्वरित कार्रवाई करते हैं। सरकार चाहे जो हो, लेकिन प्रशासन का रवैया आम जनता के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।”

यह असंतोष ऐसे समय सामने आ रहा है जब उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगा है। राज्य की विशाल आबादी और जटिल प्रशासनिक ढांचे के कारण अफसरशाही की भूमिका यहाँ हमेशा निर्णायक रही है। कानून-व्यवस्था, विकास परियोजनाएँ, कल्याणकारी योजनाएँ और चुनावी तैयारियाँ—इन सभी में प्रशासन की सक्रियता सरकार की छवि से सीधे जुड़ी होती है।

पृष्ठभूमि में देखें तो उत्तर प्रदेश में समय-समय पर यह आरोप लगते रहे हैं कि मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के दौर में निर्णय-प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो जाती है। इसका असर यह होता है कि जिला और ब्लॉक स्तर के अधिकारी जोखिम लेने से बचते हैं और केवल लिखित निर्देशों तक सीमित रहना सुरक्षित मानते हैं। कुछ विश्लेषकों के अनुसार, यही प्रवृत्ति अब विधायकों के साथ टकराव का कारण बन रही है।

एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ नौकरशाह और प्रशासनिक विशेषज्ञ ने इस मुद्दे पर कहा, “जब शासन व्यवस्था ऊपर से बहुत ज्यादा नियंत्रित हो जाती है, तो फील्ड लेवल के अधिकारी स्वाभाविक रूप से सतर्क हो जाते हैं। वे पहल करने के बजाय निर्देशों का इंतजार करते हैं, और इसका खामियाजा जनता तथा जनप्रतिनिधियों—दोनों को भुगतना पड़ता है।”

हाल के महीनों में सत्तारूढ़ दल के कुछ विधायकों ने सार्वजनिक मंचों से भी अपनी नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि विकास कार्यों की फाइलें समय पर आगे नहीं बढ़ रहीं और जनसुनवाई की व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि चुनावी वर्ष में असंतुष्ट विधायक संगठनात्मक मजबूती को कमजोर कर सकते हैं।

दूसरी ओर, विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की प्रशासनिक विफलता के रूप में पेश करने की रणनीति अपना रहा है। उनका तर्क है कि यदि सत्ता पक्ष के विधायक ही अफसरशाही से परेशान हैं, तो आम नागरिकों की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति सरकार और प्रशासन के बीच संतुलन की पुरानी बहस को फिर से सामने ला रही है। एक ओर मजबूत नेतृत्व से त्वरित निर्णय संभव होते हैं, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक केंद्रीकरण प्रशासनिक जड़ता को जन्म दे सकता है।

जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आएंगे, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अफसरशाही के साथ अपने तालमेल को कैसे सुधारती है। यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

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  • नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
    दिल से एक कहानीकार, मैं हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर नए विचार में रचनात्मकता खोजता हूँ। चाहे दिल से लिखे गए शब्दों से जुड़ाव बनाना हो, कॉफी के साथ नए विचारों पर काम करना हो, या बस आसपास की दुनिया को महसूस करना — मैं हमेशा उन कहानियों की तलाश में रहता हूँ जो असर छोड़ जाएँ।

    मुझे शब्दों, कला और विचारों के मेल से नई दुनिया बनाना पसंद है। जब मैं लिख नहीं रहा होता या कुछ नया सोच नहीं रहा होता, तब मुझे नई कैफ़े जगहों की खोज करना, अनायास पलों को कैमरे में कैद करना या अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए नोट्स लिखना अच्छा लगता है।
    हमेशा सीखते रहना और आगे बढ़ना — यही मेरा जीवन और लेखन का मंत्र है।

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नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
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