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यूजीसी नियम पर SC रोक, छात्र विभाजित

In National
January 30, 2026
rajneetiguru.com - यूजीसी नियम पर SC रोक, छात्र विभाजित। Image Credit – The Indian Express

नई दिल्ली — उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव से जुड़े नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश ने देशभर के छात्र संगठनों के बीच गहरी वैचारिक विभाजन रेखा खींच दी है। अदालत द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए “इक्विटी नियमों” के कार्यान्वयन पर रोक लगाए जाने के बाद कुछ छात्र संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है, जबकि अन्य ने इसे सामाजिक न्याय के प्रयासों पर आघात बताया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि UGC द्वारा लाए गए नए नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके कुछ प्रावधानों से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक इन नियमों की वैधानिकता और स्पष्टता की गहन समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक पुराने दिशा-निर्देश ही प्रभावी रहेंगे।

UGC द्वारा प्रस्तावित नए नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की पहचान करना, शिकायत निवारण की व्यवस्था को मजबूत बनाना और इक्विटी कमेटियों के माध्यम से पीड़ित छात्रों को त्वरित न्याय प्रदान करना था। इन कमेटियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिला और दिव्यांग छात्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना प्रस्तावित था।

हालांकि, नियमों में कुछ ऐसे प्रावधान भी थे जिन पर विवाद खड़ा हुआ। आलोचकों का कहना था कि नियमों की परिभाषाएं बहुत व्यापक हैं और इससे झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की संभावना बढ़ सकती है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इन पर अस्थायी रोक लगाने का निर्णय लिया।

छात्र राजनीति के स्तर पर इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि शिक्षा परिसरों में समानता जरूरी है, लेकिन नियम स्पष्ट और संतुलित होने चाहिए। संगठन के एक पदाधिकारी ने कहा,
“अस्पष्ट नियमों से शिक्षा का माहौल प्रभावित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आवश्यक सुधारों का अवसर देता है।”

कांग्रेस से संबद्ध नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ने भी कुछ राज्यों में फैसले का समर्थन किया है। NSUI नेताओं का मानना है कि जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए मजबूत ढांचा जरूरी है, लेकिन सभी वर्गों के अधिकारों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इसके विपरीत, वामपंथी और क्षेत्रीय छात्र संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कड़ी आलोचना की है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) के अध्यक्ष ने फैसले को “गंभीर रूप से निराशाजनक” बताते हुए कहा,
“इन नियमों का उद्देश्य उन छात्रों को सुरक्षा देना था, जिन्होंने संस्थागत भेदभाव झेला है। इस रोक से पीड़ित वर्ग की आवाज़ कमजोर होती है।”
उन्होंने जाति-आधारित भेदभाव को आपराधिक कृत्य मानने के लिए एक अलग कानून की भी मांग की।

इसी तरह, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और तृणमूल छात्र परिषद (TMCP) ने कहा कि यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में पीछे की ओर कदम है। उनका तर्क है कि भले ही नियमों में खामियां हों, लेकिन उन्हें रोकने के बजाय सुधार के साथ लागू किया जाना चाहिए था।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में मौजूद संरचनात्मक असमानताओं को उजागर करता है। एक शिक्षाविद् के अनुसार,
“चुनौती यह नहीं है कि नियम हों या न हों, बल्कि यह है कि वे न्यायपूर्ण, स्पष्ट और दुरुपयोग-रहित कैसे बनाए जाएं।”

यह मामला अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस विषय पर विस्तृत निर्णय देगा।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या UGC अपने नियमों में संशोधन करता है या कोई नया ढांचा तैयार किया जाता है। फिलहाल, यह मुद्दा देशभर के विश्वविद्यालय परिसरों में समानता, न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही बहस को और तेज कर रहा है।

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  • नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
    दिल से एक कहानीकार, मैं हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर नए विचार में रचनात्मकता खोजता हूँ। चाहे दिल से लिखे गए शब्दों से जुड़ाव बनाना हो, कॉफी के साथ नए विचारों पर काम करना हो, या बस आसपास की दुनिया को महसूस करना — मैं हमेशा उन कहानियों की तलाश में रहता हूँ जो असर छोड़ जाएँ।

    मुझे शब्दों, कला और विचारों के मेल से नई दुनिया बनाना पसंद है। जब मैं लिख नहीं रहा होता या कुछ नया सोच नहीं रहा होता, तब मुझे नई कैफ़े जगहों की खोज करना, अनायास पलों को कैमरे में कैद करना या अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए नोट्स लिखना अच्छा लगता है।
    हमेशा सीखते रहना और आगे बढ़ना — यही मेरा जीवन और लेखन का मंत्र है।

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