नई दिल्ली — भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा हाल के वर्षों में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति एक बार फिर चर्चा में है। बिहार के वरिष्ठ भाजपा नेता नितिन नवीन को महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका दिए जाने को पार्टी की ‘जेन-नेक्स्ट’ राजनीति के रूप में देखा जा रहा है। इसके उलट, कांग्रेस पार्टी की बहुचर्चित ‘50 अंडर 50’ पहल अब सवालों के घेरे में है, क्योंकि तीन वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद पार्टी अपने ही तय लक्ष्य को पूरा करने में नाकाम रही है।
कांग्रेस ने 2022 में आयोजित चिंतन शिविर के दौरान यह संकल्प लिया था कि पार्टी संगठन के सभी स्तरों पर कम से कम 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व 50 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को दिया जाएगा। हालांकि, वर्तमान आंकड़े इस संकल्प और हकीकत के बीच गहरे अंतर को दर्शाते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के 85 सदस्यों, स्थायी और विशेष आमंत्रित सदस्यों में से केवल 12 सदस्य, यानी लगभग 14 प्रतिशत, ही 50 वर्ष से कम उम्र के हैं।
इसके विपरीत, भाजपा ने संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर अपेक्षाकृत कम उम्र के नेताओं को जिम्मेदारी देने की नीति अपनाई है। नितिन नवीन जैसे नेता, जो संगठनात्मक अनुभव के साथ अपेक्षाकृत युवा माने जाते हैं, भाजपा की उस सोच को दर्शाते हैं जिसमें पार्टी भविष्य के मतदाताओं और नेतृत्व दोनों को एक साथ साधने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा,
“भाजपा यह समझ चुकी है कि युवा नेतृत्व केवल उम्र का सवाल नहीं, बल्कि निरंतरता और भविष्य की राजनीति का आधार है।”
यह बयान भाजपा की संगठनात्मक सोच को रेखांकित करता है, जहां नेतृत्व परिवर्तन को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है।
कांग्रेस के भीतर स्थिति कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। पार्टी के कई युवा नेता यह मानते हैं कि शीर्ष नेतृत्व और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में जगह न मिलने से जमीनी स्तर पर निराशा बढ़ रही है। एक युवा कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“घोषणाएं बहुत होती हैं, लेकिन जब नेतृत्व के स्तर पर बदलाव नहीं दिखता, तो कार्यकर्ताओं का भरोसा कमजोर पड़ता है।”
कांग्रेस का इतिहास युवा नेतृत्व से जुड़ा रहा है। नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक, पार्टी ने समय-समय पर अपेक्षाकृत युवा नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाया। लेकिन हाल के वर्षों में संगठनात्मक संरचना में वरिष्ठता का वर्चस्व बना रहा है, जिससे पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कांग्रेस की समस्या केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की संस्कृति से भी जुड़ी है। युवा नेताओं को संगठन में स्थान तो मिल जाता है, लेकिन उन्हें निर्णायक भूमिकाएं कम सौंपी जाती हैं। इसके चलते पार्टी की ‘50 अंडर 50’ पहल एक नारे से आगे नहीं बढ़ पाई है।
वहीं, भाजपा ने युवा चेहरों को संगठनात्मक और चुनावी जिम्मेदारियां देकर उन्हें राजनीतिक रूप से स्थापित करने की रणनीति अपनाई है। इसका असर यह हुआ है कि पार्टी के पास नेतृत्व की एक ऐसी दूसरी पंक्ति तैयार हो रही है, जो भविष्य में जिम्मेदारी संभाल सकती है।
कांग्रेस नेतृत्व की ओर से यह स्वीकार किया गया है कि संगठनात्मक सुधार एक सतत प्रक्रिया है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में कहा,
“युवा नेताओं को आगे लाना हमारी प्राथमिकता है, लेकिन इसके लिए संतुलन और अनुभव भी जरूरी है।”
हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह संतुलन अक्सर बदलाव की गति को धीमा कर देता है।
जैसे-जैसे भारतीय राजनीति में मतदाताओं की औसत उम्र घट रही है, वैसे-वैसे युवा नेतृत्व की मांग भी बढ़ रही है। इस संदर्भ में भाजपा और कांग्रेस की रणनीतियों का अंतर और स्पष्ट हो जाता है। जहां भाजपा भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर नेतृत्व तैयार कर रही है, वहीं कांग्रेस अभी भी अपने घोषित संकल्पों को जमीन पर उतारने की चुनौती से जूझ रही है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस अपनी ‘50 अंडर 50’ नीति को वास्तविक रूप से लागू कर पाती है या नहीं। वहीं, भाजपा का ‘जेन-नेक्स्ट’ मॉडल भारतीय राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की दिशा को और मजबूत कर सकता है।
