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मुकुल रॉय: राजनीति में दलों के बीच यात्रा

In Politics
February 24, 2026
rajneetiguru.com - मुकुल रॉय: बंगाल राजनीति के रणनीतिकार। Image Credit – The Indian Express

कोलकाता — पश्चिम बंगाल की राजनीति के एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अध्याय का सोमवार तड़के अंत हो गया, जब वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री Mukul Roy का कोलकाता में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और पिछले कुछ वर्षों में उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी थी। उनके निधन से न केवल तृणमूल कांग्रेस बल्कि भारतीय राजनीति ने एक ऐसे रणनीतिकार को खो दिया, जिसने अलग-अलग राजनीतिक खेमों में रहकर अपनी गहरी छाप छोड़ी।

मुकुल रॉय को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कुशल संगठनकर्ता और रणनीतिक दिमाग के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की, लेकिन 1998 में All India Trinamool Congress की स्थापना के समय वे Mamata Banerjee के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने लगे। पार्टी के शुरुआती वर्षों में संगठन खड़ा करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और जमीनी स्तर पर नेटवर्क मजबूत करने में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है।

2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे जिन चेहरों ने रणनीति तैयार की, उनमें मुकुल रॉय का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस की जीत में उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर संगठनात्मक ढांचे को दिशा दी। इसी दौरान वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने और केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में उन्हें रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंपी गई।

हालांकि, समय के साथ पार्टी के भीतर उनका प्रभाव कम होने लगा। विभिन्न भ्रष्टाचार मामलों में नाम आने और नेतृत्व के साथ मतभेद बढ़ने के बाद 2017 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया। उसी वर्ष उन्होंने Bharatiya Janata Party का दामन थामा, जिसे उस समय पश्चिम बंगाल में एक मजबूत संगठनात्मक चेहरा चाहिए था।

भाजपा में शामिल होने के बाद मुकुल रॉय को राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी दी गई और वे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। पश्चिम बंगाल में भाजपा के विस्तार की रणनीति तैयार करने में उनकी भूमिका अहम रही। 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य में भाजपा की अभूतपूर्व सफलता के पीछे उनकी संगठनात्मक समझ और राजनीतिक अनुभव को एक बड़ा कारण माना गया।

हालांकि, भाजपा के साथ उनका यह सफर भी लंबा नहीं रहा। 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस में वापसी की। यह वापसी राजनीतिक और कानूनी बहसों का विषय बनी, लेकिन तब तक उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से गिर चुका था। सक्रिय राजनीति से दूर होते गए मुकुल रॉय धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग हो गए।

उनके निधन पर राजनीतिक दलों के नेताओं ने शोक व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें लंबे समय का सहयोगी बताते हुए कहा कि पार्टी के शुरुआती दौर में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। भाजपा नेताओं ने भी उन्हें एक अनुभवी और प्रभावशाली राजनेता के रूप में याद किया, जिसने पार्टी हित से ऊपर जाकर संगठन निर्माण पर ध्यान दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुकुल रॉय का जीवन पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति का प्रतिबिंब था। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने विचारधारा से अधिक संगठन और रणनीति को प्राथमिकता दी। तृणमूल कांग्रेस को खड़ा करने से लेकर भाजपा को राज्य में मजबूती दिलाने तक, उनका सफर कई मोड़ों से भरा रहा।

उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीति के उस दौर का अंत है, जहां पर्दे के पीछे काम करने वाले रणनीतिकार सत्ता संतुलन बदलने में अहम भूमिका निभाते थे।

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  • नमस्ते, मैं सब्यसाची बिस्वास हूँ — आप मुझे सबी भी कह सकते हैं!
    दिल से एक कहानीकार, मैं हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर नए विचार में रचनात्मकता खोजता हूँ। चाहे दिल से लिखे गए शब्दों से जुड़ाव बनाना हो, कॉफी के साथ नए विचारों पर काम करना हो, या बस आसपास की दुनिया को महसूस करना — मैं हमेशा उन कहानियों की तलाश में रहता हूँ जो असर छोड़ जाएँ।

    मुझे शब्दों, कला और विचारों के मेल से नई दुनिया बनाना पसंद है। जब मैं लिख नहीं रहा होता या कुछ नया सोच नहीं रहा होता, तब मुझे नई कैफ़े जगहों की खोज करना, अनायास पलों को कैमरे में कैद करना या अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए नोट्स लिखना अच्छा लगता है।
    हमेशा सीखते रहना और आगे बढ़ना — यही मेरा जीवन और लेखन का मंत्र है।

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