कोलकाता – 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बड़ा चुनावी दांव चलते हुए 20 से अधिक राज्य स्तरीय पदों से इस्तीफा दे दिया है। मंगलवार को चुनाव आयोग (EC) को भेजे गए इस फैसले का उद्देश्य भविष्य में “लाभ के पद” (Office of Profit) से जुड़े संभावित आरोपों को पूरी तरह निष्प्रभावी करना है।
ये इस्तीफे उन विभिन्न समितियों और बोर्डों से जुड़े हैं जहाँ मुख्यमंत्री पदेन (ex-officio) प्रमुख के रूप में कार्यरत थीं। इनमें राज्य स्वास्थ्य मिशन, राज्य भूमि उपयोग बोर्ड, पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी और राज्य वन्यजीव बोर्ड जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। इन पदों को छोड़कर ममता बनर्जी उन कानूनी उलझनों से बचना चाहती हैं, जिनके कारण देश के कई बड़े नेताओं को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी है।
कानूनी कवच: ‘लाभ के पद’ के नियम से बचाव
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 191(1)(a) के तहत, कोई भी विधायक सरकार के अधीन ऐसा कोई पद नहीं संभाल सकता जिससे उसे वित्तीय लाभ या महत्वपूर्ण कार्यकारी शक्तियाँ प्राप्त हों, जब तक कि कानून द्वारा उसे छूट न दी गई हो।
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी ने पिछले विवादों से सबक लेते हुए यह एहतियाती कदम उठाया है। एक पूर्व चुनाव आयोग अधिकारी के अनुसार, “यह एक रणनीतिक कदम है। पश्चिम बंगाल जैसे हाई-स्टेक चुनाव में, विपक्षी दल नामांकन को रोकने के लिए ‘लाभ के पद’ जैसी तकनीकी खामियों को हथियार बना सकते हैं। समय रहते पद छोड़कर मुख्यमंत्री ने अपने अभियान के लिए रास्ता साफ कर लिया है।”
मतदाता सूची को लेकर घमासान: राहत और चिंता
एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री अपनी प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बंगाल के नागरिकों के लिए मतदाता सूची एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। सोमवार रात प्रकाशित हुई पहली पूरक मतदाता सूची (supplementary voter list) ने मिश्रित भावनाएं पैदा की हैं। हजारों ऐसे मतदाता जिनके नाम “अधीन अधिनिर्णय” (under adjudication/न्यायिक जांच) के तहत रखे गए थे, वे सांस रोककर अपने नाम का इंतजार कर रहे हैं।
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राहत की खबर: एसएसकेएम अस्पताल के एमबीबीएस छात्र अनुभव दास जैसे कई लोगों के लिए इंतजार खत्म हुआ और उनका नाम चुनावी रोल में आ गया है। बालीगंज के सिद्दीक आज़म खान के परिवार के तीन सदस्यों का नाम भी स्पष्ट हो गया है।
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प्रशासनिक लापरवाही का दंश: दूसरी ओर, न्यू टाउन और श्यामपुकुर जैसे इलाकों में कई मतदाताओं को भारी तनाव का सामना करना पड़ रहा है। सोमवार रात आधिकारिक वेबसाइट के काम न करने के कारण कई लोग अपना स्टेटस चेक नहीं कर पाए।
सर्वे पार्क की प्रोफेसर अफ़रोज़ा खातून जैसे कई लोग क्लर्क की गलतियों का शिकार हुए हैं। उनके नाम की स्पेलिंग गलत होने के कारण उन्हें ‘अधिनिर्णय सूची’ में डाल दिया गया, जबकि उन्होंने सभी दस्तावेज जमा कर दिए थे। उन्होंने इसे “बिना किसी गलती के उत्पीड़न” करार दिया है।
2026 की चुनावी जंग
2026 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव राज्य के इतिहास के सबसे कड़े मुकाबलों में से एक होने की उम्मीद है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक दशक से अधिक के शासन के बाद, राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर है। मतदाता सूची में “जांच के दायरे” (adjudication) में रखे गए नाम पहले ही एक राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं, जहाँ विपक्ष पक्षपात का आरोप लगा रहा है।
इंतजार में राज्य
ममता बनर्जी ने चुनावी मैदान में उतरने के लिए अपने संस्थागत पदों का त्याग कर दिया है, लेकिन चुनाव की सफलता मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निर्भर करेगी। आगामी शुक्रवार को अगली सूची जारी होगी, जो यह तय करेगी कि हजारों “जांच के दायरे” में रखे गए लोग लोकतंत्र के इस महापर्व में हिस्सा ले पाएंगे या नौकरशाही की खामियों का शिकार बनेंगे।
