मंगलूरु — 3 दिसंबर को मंगलूरु विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित गांधी–नारायण गुरु शताब्दी समारोह ने सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहकर कर्नाटक की राजनीति में एक नया सन्देश दे दिया है। इस कार्यक्रम को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बिए. के. हरिप्रसाद ने आयोजित किया था। समारोह को उस ऐतिहासिक 1925 की मुलाकात की शताब्दी के रूप में मनाया गया, जब स्वतंत्रता संग्राम के महानायक महात्मा गांधी और दक्षिण के समाज सुधारक नारायण गुरु के बीच संवाद हुआ था।
परन्तु इस सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि वाले आयोजन ने राजनीतिक पृष्ठभूमि भी प्रकट कर दी। समारोह में राज्य के मुख्यमंत्री Siddaramaiah की मौजूदगी और उनके करीबी सहयोगी D. K. Shivakumar की अनुपस्थिति ने कांग्रेस में चल रही अंदरूनी शक्ति गणित और OBC प्रतिबद्धता का संकेत माना जाने लगा।
यह आयोजन उन्होंने इस कारण किया था कि “नारायण गुरु द्वारा दिए गये समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता के आदर्शों को आज फिर सामने लाया जा सके” — बिए. के. हरिप्रसाद ने समारोह में कहा।
नारायण गुरु को विशेष रूप से दक्षिण कन्नड़ के बिलावा-इडिगा समुदाय सहित अन्य पिछड़ी व OBC जातियों ने सदैव आदर दिया है। समारोह में ऐसे समुदायों का जमावड़ा देखने को मिला, जिससे स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस OBC समर्थन को फिर से मज़बूत करना चाहती है।
इसी माहौल में, मुख्यमंत्री सिद्धरमय्या की उपस्थिति और शिवकुमार की गैर-मौजूदगी सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं थी — यह स्पष्ट राजनीतिक बयान की तरह नजर आया। कठिन सवाल यह उठा कि क्या पार्टी आलाकमान अब राज्य के नेतृत्व को लेकर अपनी प्राथमिकताएं फिर से तय कर रही है।
कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ संगठन नेता और राष्ट्रीय प्रभारी संगठन मामलों के प्रभारी, K. C. Venugopal भी शामिल थे। उनकी मौजूदगी ने इस संकेत को और मजबूत कर दिया कि यह आयोजन केवल सांस्कृतिक समारोह न होकर राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर चुका था।
किसी राजनीतिक विश्लेषक ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यह समारोह सिर्फ स्मरणोत्सव नहीं था, बल्कि कांग्रेस के भीतर पावर बैलेंस का एक संकेत था।” कई लोग इसे आगामी नेतृत्व फेरबदल या सत्ता हस्तांतरण की दिशा में उठाया गया एक पहला कदम मान रहे हैं।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों से चर्चा थी कि राज्य में सत्ता सौदे के अनुसार शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात हो रही है। लेकिन इस समारोह में उनकी अनुपस्थिति और प्रत्यक्ष रूप से सिद्धरमय्या-भाजप समर्थक गठजोड़ की उपस्थिति ने उन अनुमानों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है।
कुछ समर्थकों ने तो हल्ला भी किया, लेकिन समारोह के आयोजकों ने इसे पूर्णतया सामाजिक-सांस्कृतिक व धार्मिक दृष्टिकोण से आयोजित बताया। फिर भी, ये वे संकेत थे जिनके अर्थ राजनीति के दायरे से बाहर नहीं रह सकते थे।
1925 में हुए उस संवाद ने भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलन व स्वतंत्रता आंदोलनों में महत्वपूर्ण स्थान पाया। उस समय नारायण गुरु ने जातिगत असमानता, ब्राह्मणवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई थी — और उनके आदर्शों ने दबे-कुचले व पिछड़े समुदायों के आत्म-सम्मान व सामाजिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया।
गांधी भी उस समय सामाजिक समानता और दलित-अछूतों के अधिकारों के पक्षधर थे। उनके एवं नारायण गुरु के बीच हुई बातचीत ने सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक समानता व सामाजिक न्याय के संदेश को मजबूत किया था। आज, उसी संवाद की शताब्दी पर आयोजित समारोह में कांग्रेस द्वारा OBC समुदाय की भागीदारी व नेतृत्व की असहमति ने यह दर्शाया कि सामाजिक न्याय का एजेंडा अब राजनीतिक रणनीति से जुड़ा हुआ है।
मंगलूरु में हुए गांधी–नारायण गुरु शताब्दी समारोह ने सिर्फ एक स्मृति-सभा नहीं, बल्कि कर्नाटक की राजनीति में एक संकेत-स्थल बनने का काम किया। मुख्यमंत्री सिद्धरमय्या की मौजूदगी, शिवकुमार की गैर-हाजिरी और OBC-दलित समर्थन की झलक ने कांग्रेस में नेतृत्व और सत्ता के भविष्य को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। इस बहस का अगला अध्याय पार्टी हाई-कमांड और स्थानीय ओबीसी समीकरण तय करेंगे — और यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अगले हफ्तों में किस दिशा का चुनाव करती है।
