यूएस और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की विदेश नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने स्पष्ट किया है कि भारत ने कभी भी किसी देश में बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत को भारत की विदेश नीति की स्थायी विशेषता के रूप में देखा जाना चाहिए।
संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के सदस्य मनीष तिवारी ने यह टिप्पणी ऐसे समय में की है जब पश्चिम एशिया में हालात अस्थिर बने हुए हैं और अमेरिका तथा ईरान के बीच टकराव की आशंका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री के इज़राइल दौरे को लेकर कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवालों को उन्होंने “पूरी तरह वैध” बताया।
तिवारी ने कहा, “भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत यह रहा है कि किसी भी देश में लोकतंत्र या शासन व्यवस्था को बाहर से बल प्रयोग के जरिए नहीं थोपा जा सकता।” उन्होंने अमेरिका की बीते दो दशकों की सैन्य कार्रवाइयों का हवाला देते हुए कहा कि इतिहास ने यह दिखाया है कि जबरन सत्ता परिवर्तन न केवल अस्थिरता बढ़ाता है, बल्कि दीर्घकालिक समाधान भी नहीं देता।
अपने बयान में तिवारी ने विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए सैन्य हस्तक्षेपों की आलोचनात्मक समीक्षा की। उन्होंने कहा, “अमेरिका ने करीब तीन ट्रिलियन डॉलर खर्च करने के बाद 2021 में अफगानिस्तान को वापस तालिबान के हवाले कर दिया। इसी तरह इराक पर आक्रमण की लागत भी लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर रही। सवाल यह है कि क्या अंतिम विश्लेषण में यह सब सार्थक साबित हुआ?”
उनका यह बयान उस व्यापक बहस की ओर इशारा करता है, जिसमें पश्चिमी देशों की सैन्य रणनीतियों और उनके दीर्घकालिक परिणामों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। तिवारी का कहना था कि ऐसे हस्तक्षेपों से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी है और कट्टरपंथी ताकतों को पनपने का अवसर मिला है।
प्रधानमंत्री के इज़राइल दौरे को लेकर कांग्रेस की आपत्तियों पर प्रतिक्रिया देते हुए तिवारी ने कहा कि भारत को पश्चिम एशिया में संतुलित कूटनीति अपनानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के ऐतिहासिक रूप से ईरान और इज़राइल — दोनों के साथ संबंध रहे हैं और किसी एक पक्ष के अत्यधिक निकट जाने से क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
कांग्रेस का मानना है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। इस पृष्ठभूमि में, पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़राइल दौरे को केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित न मानकर व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में देखने की मांग कर रही है।
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यूएस-ईरान तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए संतुलन बनाए रखना और किसी भी सैन्य गुटबंदी से दूरी रखना कूटनीतिक रूप से अहम हो जाता है।
मनीष तिवारी के बयान से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस भारत की विदेश नीति को गैर-पक्षपाती और अंतरराष्ट्रीय कानून आधारित बनाए रखने की वकालत कर रही है। उनका तर्क है कि भारत को अपनी ऐतिहासिक भूमिका के अनुरूप शांति, संवाद और कूटनीति के जरिए संघर्ष समाधान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में हालात बदल रहे हैं, भारत की विदेश नीति पर घरेलू राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष इस संवेदनशील वैश्विक मुद्दे पर किस तरह का संतुलन स्थापित करते हैं।
