नई दिल्ली — भारत की आर्थिक कूटनीति पर छिड़े राजनीतिक वाकयुद्ध में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्ष के नेता (LoP) राहुल गांधी पर तीखा हमला किया है। गोयल ने कांग्रेस नेता पर हाल ही में संपन्न भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के संबंध में “प्रायोजित” (stage-managed) और “मनगढ़ंत” विमर्श बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए देश के किसानों को जानबूझकर गुमराह कर रहा है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने दावा किया कि यह व्यापार समझौता अमेरिकी हितों के सामने “आत्मसमर्पण” है और भारतीय अन्नदाताओं (किसानों) की आजीविका के लिए “सीधा खतरा” है। इन आरोपों का खंडन करते हुए गोयल ने जोर देकर कहा कि इस समझौते में संवेदनशील क्षेत्रों पर “शून्य समझौते” (zero-compromise) का रुख अपनाया गया है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि किसानों, एमएसएमई (MSME) और युवाओं के हित पूरी तरह सुरक्षित रहें।
विवाद का स्वरूप: “फर्जीवाड़ा” बनाम “आत्मसमर्पण”
यह टकराव ‘भारत-अमेरिका अंतरिम पारस्परिक व्यापार समझौते’ पर केंद्रित है, जो फरवरी 2026 की शुरुआत में घोषित एक ढांचा है। यह सौदा दो बड़े देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को नए सिरे से संतुलित करने का प्रयास करता है, जिसमें अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक शुल्क (tariffs) को 50% से घटाकर 18% करने पर सहमत हुआ है।
सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक देर रात के वीडियो संदेश में मंत्री गोयल ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। गोयल ने कहा, “राहुल गांधी ने एक बार फिर एक प्रायोजित, अत्यंत कृत्रिम और फर्जी विमर्श पेश किया है। इस बार वह कांग्रेस पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहे हैं, जो किसान नेता होने का नाटक कर रहे हैं। मुझे राहुल जी के इस फर्जीवाड़े का ‘रियलिटी चेक’ करने दें और हमारे निर्दोष, मेहनती अन्नदाताओं को गुमराह करने के लिए उन्हें और उनके दोस्तों को बेनकाब करने दें।”
इसके विपरीत, राहुल गांधी ने इस समझौते की एक भयावह तस्वीर पेश की है। संसद भवन में 17 प्रमुख किसान संघों के साथ बैठक के बाद गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने कृषि समुदाय के साथ “विश्वासघात” किया है। गांधी ने एक्स (X) पर पोस्ट किया, “नरेन्द्र ‘सरेंडर’ मोदी ने भारतीय किसानों को धोखा दिया है और किसान अब यह समझ गए हैं। यह केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि हमारे किसानों पर सीधा हमला है।” उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिकी कृषि उत्पादों की आवक से भारतीय बाजारों में बाढ़ आ जाएगी, जिससे सोया, मक्का और कपास की घरेलू कीमतें गिर जाएंगी।
व्यापार समझौते की तथ्य-जांच: वास्तव में मेज पर क्या है?
इन आरोपों की गंभीरता को समझने के लिए अंतरिम सौदे के विशिष्ट प्रावधानों को देखना होगा। वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 90-95% भारतीय कृषि उत्पादों को “नकारात्मक सूची” (negative list) में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि उन्हें कोई शुल्क रियायत नहीं दी गई है।
सुरक्षित क्षेत्र (नकारात्मक सूची):
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प्रमुख अनाज: गेहूं, चावल, मक्का और मोटे अनाज।
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डेयरी और पोल्ट्री: दूध, घी, मक्खन और चिकन उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
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संवेदनशील फल: केला, स्ट्रॉबेरी और खट्टे फल।
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जीएम उत्पाद: भारत ने जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) खाद्य पदार्थों पर अपना सख्त प्रतिबंध बरकरार रखा है।
जहाँ भारत ने पहुंच प्रदान की है: भारत ने उन उत्पादों के लिए “नपा-तुला” (calibrated) प्रवेश दिया है जहाँ घरेलू कमी है, विशेष रूप से पशुपालन और पोल्ट्री क्षेत्रों के लिए।
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रेड सोरघम और DDGS: उच्च प्रोटीन वाले पशु चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।
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प्रीमियम वस्तुएं: अमेरिकी अखरोट, बादाम और उच्च श्रेणी की वाइन एवं स्पिरिट के लिए सीमित पहुंच (न्यूनतम आयात मूल्य के अधीन)।
“जब मैं कहता हूं कि सभी समूहों के हित सुरक्षित हैं, तो मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। यह समझौता हमारे निर्यात के लिए विशाल बाजार खोलकर किसानों, मछुआरों और युवाओं की मदद करेगा।” — पीयूष गोयल, केंद्रीय मंत्री।
आर्थिक प्रभाव: एमएसएमई और वैश्विक मूल्य श्रृंखला
कृषि से इतर, सरकार का तर्क है कि यह सौदा भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक बड़ी जीत है। अमेरिकी शुल्क को 18% तक कम करने से कपड़ा, चमड़ा, जूते और जैविक रसायनों में भारतीय निर्यात 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार में काफी प्रतिस्पर्धी होने की उम्मीद है।
उद्योग विशेषज्ञों का सुझाव है कि यह सौदा एक पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के अग्रदूत के रूप में कार्य करता है। सरकार को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका को भारतीय निर्यात वर्तमान ₹5 लाख करोड़ से दोगुना होकर ₹10 लाख करोड़ हो जाएगा। इसके अलावा, भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर मूल्य की अमेरिकी ऊर्जा, विमान और तकनीक खरीदने का “इरादा” व्यक्त किया है, जिससे ट्रंप प्रशासन के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत होंगे।
किसान संघ विभाजित: चिंता बनाम अवसर
जहाँ सरकार सुरक्षा उपायों पर जोर दे रही है, वहीं कई किसान संगठन सतर्क हैं। ‘आशा-किसान स्वराज’ जैसे संगठनों ने ‘ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स’ (DDGS) के आयात को लेकर चिंता जताई है। हालांकि सरकार इसे “प्रसंस्कृत चारा इनपुट” के रूप में वर्गीकृत करती है, लेकिन किसानों को डर है कि यह परोक्ष रूप से घरेलू मक्का और सोयाबीन की कीमतों को प्रभावित करेगा, जो वर्तमान में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मूल्य संकट का सामना कर रहे हैं।
गांधी ने संघों के साथ अपनी बातचीत के दौरान कहा, “यह लड़ाई असमान है। सरकार एकतरफा दबाव बना रही है। इतने बड़े फैसले से पहले किसानों की सहमति की आवश्यकता थी।”
जवाब में, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गोयल के साथ मिलकर इन आशंकाओं को खारिज किया और गांधी को “आदतन झूठ बोलने वाला” और “प्रगति-विरोधी” कहा। चौहान ने उल्लेख किया कि इस सौदे से प्रेरित वैश्विक कपड़ा बाजार में भारतीय कपास की बढ़ती मांग वास्तव में भारतीय कपास किसानों के लिए उच्च कीमतों का परिणाम देगी।
आगे की राह
चूंकि औपचारिक समझौते पर मार्च 2026 के मध्य तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है, नई दिल्ली में राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है। सरकार इस व्यापार समझौते को ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए एक “शुभ संकेत” के रूप में देखती है, जबकि विपक्ष इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखता है।
असली परीक्षा अंतरिम समझौते के “बारीक विवरण” (fine print) में छिपी होगी। क्या चारे के नपे-तुले आयात से अनाज किसानों को नुकसान पहुँचाए बिना पोल्ट्री उद्योग को मजबूती मिलेगी, यह देखना अभी बाकी है। फिलहाल, “विमर्श की जंग” जोरों पर है, जिसके केंद्र में लाखों किसानों की आजीविका है।
