नई दिल्ली – अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक शुल्कों (Tariffs) को रद्द करने के ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत में राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। वाशिंगटन में हुए इस कानूनी बदलाव का हवाला देते हुए, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। गांधी ने आरोप लगाया कि अमेरिका के साथ सरकार का हालिया अंतरिम व्यापार समझौता राष्ट्रीय हितों के साथ “विश्वासघात” है।
यह विवाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 6-3 के उस फैसले से उपजा है, जिसमें कहा गया कि ट्रंप प्रशासन ने 1977 के ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट‘ (IEEPA) के तहत अपने कानूनी अधिकार का उल्लंघन किया था। हालांकि इस फैसले ने पिछले शुल्क शासन को शून्य कर दिया है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत 10% वैश्विक शुल्क के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करने की घोषणा कर दी है।
“समझौतावादी” नेतृत्व: राहुल गांधी का आरोप
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर व्यापार वार्ताओं को संभालने के प्रधानमंत्री के तरीके की आलोचना की। गांधी ने लिखा, “पीएम समझौतावादी (Compromised) हैं। उनका विश्वासघात अब बेनकाब हो गया है। वह फिर से बातचीत नहीं कर सकते। वह फिर से आत्मसमर्पण करेंगे।” कांग्रेस नेता के बयानों का तात्पर्य है कि भारत सरकार ने जल्दबाजी में एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसने भारत को कुछ शर्तों में बांध दिया, जबकि अन्य देश अब बिना किसी रियायत के अमेरिकी अदालत के हस्तक्षेप का लाभ उठा सकते हैं।
भू-राजनीतिक निहितार्थों पर टिप्पणी करते हुए, व्यापार विशेषज्ञ डॉ. अमृता सेन ने कहा: “अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने व्यापार नीति में अचानक एक शून्यता पैदा कर दी है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है: अपने द्वारा हस्ताक्षरित अंतरिम समझौते की शर्तों का बचाव करना और संभावित नए 10% शुल्क के बीच रास्ता निकालना। विपक्ष की आलोचना का मुख्य बिंदु समय और खोए हुए ‘लीवरेज’ (प्रभाव) पर केंद्रित है, विशेष रूप से ऊर्जा संप्रभुता और कृषि सुरक्षा के मामले में।”
संप्रभुता और रूसी तेल का कारक
गांधी की भावनाओं को दोहराते हुए, शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर करने की “जल्दबाजी” पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि अदालत के हस्तक्षेप के कारण अमेरिका के साथ वैश्विक व्यापार पर अब 10% शुल्क लग सकता है, लेकिन भारत को दी गई रियायतें और शर्तें अब विवादास्पद हो गई हैं।
चतुर्वेदी ने विशेष रूप से रूसी तेल के मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने तर्क दिया कि चीन जैसे देशों ने अमेरिकी शुल्कों के बावजूद बिना किसी परिणाम के सस्ता रूसी तेल खरीदने का अपना अधिकार बरकरार रखा है। इसके विपरीत, उन्होंने आरोप लगाया कि भारत ने इस समझौते के हिस्से के रूप में रूसी तेल खरीदने का अपना प्रभाव “गंवा दिया” है। उन्होंने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने अपनी संप्रभुता के साथ समझौता नहीं किया, जबकि भारतीय व्यापार मंत्री की नीतियों ने भारत को कमजोर स्थिति में खड़ा कर दिया है।
भारत-अमेरिका व्यापार तनाव
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध तनावपूर्ण रहे हैं, विशेष रूप से चिकित्सा उपकरणों की मूल्य निर्धारण और कृषि बाजार पहुंच को लेकर। “अंतरिम समझौते” का उद्देश्य एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की ओर एक कदम बढ़ाना था।
सरकार ने लगातार इस सौदे का बचाव करते हुए इसे एक “ऐतिहासिक” उपलब्धि बताया है जो संरक्षणवादी वैश्विक माहौल में भारतीय निर्यात को सुरक्षित करती है। हालांकि, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विपक्ष को यह दावा करने का नया मौका दे दिया है कि यदि भारत अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया के समाप्त होने का इंतजार करता, तो वह बेहतर शर्तें हासिल कर सकता था।
