पटना — बिहार में हालिया चुनावी झटके के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) अब संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर रीसेट मोड में नजर आ रहा है। पार्टी के भीतर मंथन तेज है और संकेत मिल रहे हैं कि तेजस्वी यादव को आने वाले समय में और बड़ी भूमिका सौंपी जा सकती है। नेतृत्व और रणनीति दोनों स्तरों पर बदलाव पर चर्चा हो रही है, ताकि पार्टी को दोबारा जनाधार से जोड़ा जा सके।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, RJD अब विपक्ष की भूमिका को केवल सरकार की आलोचना तक सीमित रखने के बजाय जनसंवाद आधारित राजनीति की ओर बढ़ना चाहती है। हाल की बैठकों में यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि नेताओं को नीतीश कुमार सरकार की हर कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देने के बजाय जनता के बीच जाकर मुद्दों को समझने और उठाने पर ध्यान देना चाहिए।
RJD के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,
“अब जरूरत है कि हमारे नेता ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलें, उनकी समस्याएं सुनें और जमीनी मुद्दों को प्राथमिकता दें। सिर्फ सरकार की आलोचना करने से राजनीतिक भरोसा वापस नहीं आएगा।”
यह बयान पार्टी की नई सोच को दर्शाता है, जिसमें संवाद और संगठन को केंद्र में रखा जा रहा है।
तेजस्वी यादव, जो पहले ही RJD का सबसे प्रमुख चेहरा माने जाते हैं, इस बदलाव के केंद्र में हैं। नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को उठाया, लेकिन पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अब उन्हें संगठन निर्माण और जनसंपर्क में और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि उन्हें जल्द ही संगठनात्मक स्तर पर अधिक औपचारिक जिम्मेदारी दी जा सकती है।
राजद का इतिहास बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीति से गहराई से जुड़ा रहा है। लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पार्टी ने 1990 के दशक में एक मजबूत जनाधार बनाया था। हालांकि, बदलते राजनीतिक समीकरणों, नए मतदाता वर्ग और गठबंधन राजनीति ने पार्टी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हालिया चुनावी परिणामों ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया है कि पुराने राजनीतिक ढांचे में बदलाव जरूरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव के पास युवा मतदाताओं से जुड़ने की क्षमता है, लेकिन इसके लिए उन्हें केवल विधानसभा या मीडिया तक सीमित रहने के बजाय जमीनी आंदोलन और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता दिखानी होगी। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार,
“तेजस्वी की स्वीकार्यता शहरी और युवा वर्ग में बढ़ी है, लेकिन इसे वोट में बदलने के लिए संगठनात्मक विस्तार जरूरी है।”
RJD की नई रणनीति का एक अहम पहलू यह भी है कि पार्टी अपने नेताओं को जिला और प्रखंड स्तर पर ज्यादा सक्रिय करेगी। स्थानीय कार्यक्रम, जनसभाएं और मुद्दा आधारित अभियान पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल किए जा रहे हैं। इससे न केवल पार्टी कैडर को सक्रिय किया जा सकेगा, बल्कि मतदाताओं के साथ सीधा संवाद भी स्थापित होगा।
वहीं, नीतीश कुमार सरकार को लेकर पार्टी की रणनीति में भी संतुलन लाने की कोशिश की जा रही है। RJD नेतृत्व का मानना है कि हर नीति या फैसले पर त्वरित प्रतिक्रिया देने से पार्टी की छवि केवल “प्रतिक्रियाशील विपक्ष” की बनती है। इसके बजाय, दीर्घकालिक मुद्दों पर केंद्रित रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने पर जोर दिया जा रहा है।
पार्टी के अंदरूनी संकेत बताते हैं कि आने वाले महीनों में संगठनात्मक फेरबदल, युवा नेताओं को आगे लाने और तेजस्वी यादव की भूमिका को और मजबूत करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। यह रणनीति RJD को न केवल आगामी चुनावों के लिए तैयार करने का प्रयास है, बल्कि पार्टी को नए राजनीतिक दौर के अनुरूप ढालने की भी कोशिश है।
बिहार की राजनीति में जहां गठबंधन और नेतृत्व तेजी से बदलते हैं, वहां RJD का यह रीसेट यह तय करेगा कि पार्टी भविष्य में सत्ता की राजनीति में किस हद तक प्रभावी भूमिका निभा पाती है। फिलहाल, तेजस्वी यादव इस बदलाव के सबसे अहम चेहरे के रूप में उभरते दिख रहे हैं।
